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रेल हादसे को बीत गए 13 साल, परिवार को अब तक नहीं मिला डेथ सर्टिफिकेट

Updated on 05-06-2023 06:59 PM
कोलकाता: बंगाल की एक पीड़िता को पिता की मौत के 13 साल बीत जाने के बाद भी डेथ सर्टिफिकेट नहीं मिला है। हावड़ा की पॉलोमी अट्टा उस वक्त महज पांच साल की थी, जब उन्होंने 28 मई, 2010 को अपने पिता को खो दिया था। पिता यह कहकर निकले थे कि वह उसके लिए उपहार लाएंगे। पीड़ित झारग्राम के पास सरडीहा और खेमासुली स्टेशनों के बीच चलने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में सफर कर रहे थे। इस ट्रेन हादसे में 148 लोगों की मौत हो गई थी। हैरानगी की बात यह है कि तेरह साल बीत जाने के बाद भी प्रेसेनजीत प्रशासन की डायरियों में गुमशुदा के रूप में दर्ज हैं।

पीड़िता पॉलोमी ने सुनाई आपबीती

बीते एक साल पहले अपनी मां को भी खो चुकी पॉलोमी ने मामले से जुड़ी आपबीती हमारे सहयोगी टीओआई को सुनाई। पॉलोमी के मुताबिक, 'मां जुथिका ने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगा था, क्योंकि परिवार को प्रारंभिक मुआवजा दिया गया था और प्रसेनजीत को लापता बताया गया था। मेरी मां ने झारग्राम में सिविल जज की अदालत जाने से पहले सीएम ममता बनर्जी, रेल मंत्रियों और विधायकों से मिलने की कोशिश की। हमारे घर का खर्च चलाने वाली एक मात्र मां को खोने के बाद हम सड़क पर आ गये। अब मैं मां का मिशन जारी रखूंगी।'

रेल हादसे में कई पीड़ित अनदेखी का शिकार

हरे स्ट्रीट के सुरेंद्र सिंह और लिलुआ के राजेश कुमार बोथरा जैसे अन्य लोगों ने प्रशासन के खिलाफ 2018 में अदालत का रुख किया। 2022 में हुई सुनवाई में रेलवे ने तथ्यों की जरूरत पर सवाल उठाया, जिसके बाद राज्य सरकार अभी भी मामले में पेश तक नहीं हुई है। हादसे में सिंह और बोथरा दोनों ने अपनी पत्नियों और बच्चों को खो दिया था। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे में चार पीड़ित परिवारों के वकील तीर्थंकर भक्त ने कहा, 'अब जैसा कि हम एक और रेल दुर्घटना को देखते हैं, कोई भी मंत्री या नौकरशाह इन पीड़ितों के लिए कदम नहीं उठा सकता है।'

आवेदन के लिए डेथ सर्टिफिकेट सबसे जरूरी

पीड़ितों के वकील के मुताबिक मृत्यु प्रमाण पत्र न होने का मतलब है कि परिवार लाभ के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं। प्रमाण पत्र महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि रेलवे ने पीड़ितों के परिजनों के लिए नौकरी का वादा किया था। एसईआर प्रवक्ता ने कहा 'मृत्यु प्रमाण पत्र राज्य द्वारा जारी किया जाएगा, रेलवे द्वारा नहीं। राज्य सरकार के अधिकारी शायद उन दस्तावेजों से आश्वस्त नहीं थे, जो परिवारों ने जमा किए थे। हाई कोर्ट के अधिवक्ता बिवास चटर्जी ने कहा, 'मानदंड कहता है कि किसी को सात साल की अनुपस्थिति में मृत घोषित किया जा सकता है, जब तक कि सबूत नहीं है कि वह जीवित है।'

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