मजदूरों का हक मार रही हैं बड़ी कंपनियां! अमेरिका के इतिहास में कभी नहीं हुआ ऐसा
Updated on
13-01-2026 02:31 PM
नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश को फिर से महान बनाने के लक्ष्य को लेकर काम कर रहे हैं। लेकिन देश में वर्कर्स की हालत दिन ब दिन बदतर होती जा रही है। अमेरिका की जीडीपी में लेबर यानी नॉन-फार्म वर्कर्स की हिस्सेदारी अब 53.8 फीसदी रह गई है जो 1947 के बाद सबसे कम है। इस तरह के आंकड़ों को जमा करने की शुरुआत 1947 में हुई थी। इससे पता चलता है कि इकनॉमिक आउटपुट का कितना हिस्से वेज, सैलरी, बोनस और बेनिफिट्स के रूप में वर्कर्स को मिल रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक 1950 में यह करीब 65% था जबकि 1960 में रेकॉर्ड 66% पहुंच गया था। साल 2001 में यह 64 फीसदी था लेकिन उसके बाद से इसमें 10.4 फीसदी गिरावट आई है। इस दौरान कॉरपोरेट प्रॉफिट मार्जिन 10.9 फीसदी पहुंच गया है जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा रेकॉर्ड है। इसका मतलब है कि वर्कर्स ज्यादा प्रोड्यूस कर रहे हैं लेकिन मुनाफे का मोटा हिस्सा कंपनियों की जेब में जा रहा है।
क्या होगा असर?
जानकारों का कहना है कि ऑटोमेशन के यूज से कंपनियों में प्रोडक्टिविटी बढ़ी है लेकिन इसका इस्तेमाल वर्कर्स की सैलरी बढ़ाने के बजाय प्रॉफिट बढ़ाने में किया जा रहा है। इससे देश में अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ रही है क्योंकि केवल कुछ ही लोगों को इसका फायदा हो रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका देश की इकॉनमी पर प्रतिकूल असर हो सकता है।
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