क्या सेंट्रल डेप्युटेशन का आईपीएस ऑफिसर स्टेट कैडर में लौटने से इनकार कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट का सरकार से सवाल
Updated on
10-01-2023 05:30 PM
नई दिल्ली: क्या सेंट्रल डेप्युटेशन पर तैनात स्टेट कैडर का कोई सीनियर आईपीएस ऑफिसर डीजीपी का पोस्ट ठुकरा सकता है? क्या संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) द्वारा डीजीपी पद के लिए सुझाए गए नामों की लिस्ट में ऐसे किसी ऑफिसर का नाम शामिल हो तो क्या उसके पास अधिकार है कि वो डीजीपी बनने से इनकार कर दे? देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को यही सवाल केंद्रीय गृह मंत्रालय से पूछा। दरअसल, नागालैंड सरकार के एडवोकेट जनरल केएन बालगोपाल ने प्रदेश के डीजीपी पद के लिए सिर्फ एक नाम की सिफारिश करने पर यूपीएससी का विरोध किया। यूपीएससी ने 1992 बैच के आईपीएस ऑफिसर रूपिन शर्मा का नाम भेजा है। एडवोकेट जनरल ने कहा कि यह प्रकाश सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले का उल्लंघन है। उन्होंने शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यूपीएससी के पैनल को तीन नाम सुझाने चाहिए ताकि राज्य उनमें किसी एक को नया डीजीपी बना सके।
यूपीएससी ने बताया- अनिच्छुक हैं ऑफिसर
नागालैंड की आपत्ति पर यूपीएससी का पक्ष रख रहे वकील नरेश कौशिक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नागालैंड के वरिष्ठतम आईपीएस ऑफिसर सुनील आचार्य ने वापस स्टेट कैडर में जाने को लेकर अनिच्छा जताई। बाकी किसी आईपीएस ऑफिसर को सेवा में रहे कम से कम 30 वर्ष नहीं हुआ है जो डीजीपी पद के लिए न्यूनतम अर्हता है। इस कारण सिर्फ रूपिन शर्मा का नाम ही भेजना पड़ा। सुनील आचार्य 1991 बैच के आईपीएस ऑफिसर हैं। वो अभी मंत्रीमंडल सचिवालय में संयुक्त निदेशक के तौर पर तैनात हैं।
यूपीएससी ने दिया परंपरा का हवाला
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि आईपीएस ऑफिसर की अनिच्छा का कोई महत्व नहीं है क्योंकि वो जरूरत पड़ने पर अपने स्टेट कैडर में वापस जाने को बाध्य हैं। तब कौशिक ने कहा कि अनिच्छुक ऑफिसरों को स्टेट कैडर में वापस भेजने की सिफारिश नहीं करने की परंपरा रही है। कौशिक ने यह भी बताया कि यूपीएससी ने पूर्वोत्तर राज्यों, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के डीजीपी पोस्ट के लिए न्यूनतम अनुभव का वर्ष 30 से 25 करने की सिफारिश की है जिस पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय से किया सवाल
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से एक हफ्ते के अंदर हलफनामा देने को कहा कि क्या सेंट्रल डेप्युटेशन वाले आईपीएस ऑफिसर का नाम स्टेट कैडर में वापस भेजे जाने वालों की लिस्ट में शामिल करने के लिए उसकी सहमति जरूरी है? अगर है तो किस नियम के तहत? शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय से यह भी पूछा कि क्या सुनील आचार्य अभी जिस पद पर हैं, उन्हें उस दायित्व से मुक्त किया जा सकता है ताकि नागालैंड के डीजीपी के तौर पर सबसे सीनियर आईपीएस ऑफिसर के नाम की सिफारिश की जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय से वह लेटर भी पेश करने को कहा जिसे लेकर यूपीएससी ने दावा किया कि कुछ राज्यों के डीजीपी पोस्ट के लिए अनुभव सीमा 30 की वजह 25 वर्ष करने को सैद्धांतिक सहमति दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 23 जनवरी को होगी।
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