जहां जैसी जरूरत हो, शाह वैसा संकेत दे आते हैं। कर्नाटक के कई वरिष्ठ भाजपा पदाधिकारी इस बात को लेकर असंतोष जता रहे थे कि हाई कमान येदियुरप्पा को ज्यादा तवज्जो देता है। शुक्रवार को बेंगलुरु पहुंचे शाह कई कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद येदियुरप्पा के घर भी गए। उन्होंने वहां नाश्ता किया और उनके घरवालों से भी मिले। यह नाश्ता असंतुष्ट नेताओं के लिए एक बड़ा संदेश है। परिवारवाद से बचते हुए अब खबरें यह भी आ रही हैं कि येदि के छोटे बेटे विजयेंद्र को भाजपा वरुणा से उतार सकती है। यहां से कांग्रेस के सिद्धारमैया लड़ रहे हैं।
शाह ने यूपी-बिहार, एमपी ही नहीं, पूर्वोत्तर को भाजपा का गढ़ बना दिया है। पंचायत से पार्लियामेंट की रणनीति उनकी काफी सफल रही। उन्होंने किसी भी चुनाव को छोटा नहीं समझा। विपक्षी यह कहकर तंज कसते रहे कि भाजपा के स्थानीय चुनाव में भी बड़े नेता प्रचार करने पहुंच जाते हैं लेकिन शाह ने हर चुनाव को बराबर तवज्जो दी। उसका असर भी दिख रहा है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा हो या दक्षिण के राज्य, सियासत में शाह का सिक्का जम चुका है। वह होमवर्क करते हैं फिर किसी नतीजे पर पहुंचते हैं। पार्टी का एजेंडा बताने में कोई कोताही नहीं करते। उन्हें एक बड़ा तबका नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखता है।
