पिता की जाति बच्चे पर जबरन नहीं थोप सकते, सिंगल मदर केस में बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
Updated on
19-02-2026 01:38 PM
मुंबई : बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिंगल मदर केस में एक अहम फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि जिस बच्ची का पालन-पोषण केवल उसकी मां ने किया हो, उसे केवल इसलिए अपने पिता का उपनाम और जाति धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि पहले ऐसा करना अनिवार्य है। यह आदेश 12 वर्षीय बच्ची की ओर से दायर याचिका के जवाब में आया है, जिसमें उसने स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम और जाति प्रविष्टि 'मराठा' से 'अनुसूचित जाति' में बदलने की मांग की थी।
माध्यमिक विद्यालय संहिता का हवाला देते हुए स्कूल अधिकारियों ने पिछले वर्ष बच्ची के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। बुधवार को जारी हाई कोर्ट के फैसले में कहा गया है कि किसी बच्चे की नागरिक पहचान के लिए एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं है; यह संवैधानिक निष्ठा है। यह पितृसत्तात्मक बाध्यता से संवैधानिक विकल्प की ओर, वंश को भाग्य मानने से गरिमा को अधिकार मानने की ओर बदलाव को दर्शाता है।
कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने आगे कहा, 'एक ऐसा समाज जो खुद को विकासशील कहता है, वह इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान उस पिता से जुड़ी होनी चाहिए। ऐसा पिता, जो उसके जीवन में अनुपस्थित है। मां जो उसका पालन-पोषण का पूरा भार वहन करती है, प्रशासनिक रूप से गौण बनी रहे। राज्य के नियम नैतिक निर्णय नहीं बनने चाहिए। उन्हें कल्याण के सटीक साधन बनने चाहिए।'
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और एच एस वेनेगांवकर ने 2 फरवरी के अपने फैसले में कहा कि स्कूल रिकॉर्ड कोई निजी दस्तावेज नहीं बल्कि एक सार्वजनिक दस्तावेज है जो बच्चे के जीवन में वर्षों, संस्थानों और कभी-कभी पेशेवर क्षेत्र तक उसके साथ रहता है। उन्होंने आगे कहा कि यदि बच्चे की अभिभावक मां है, तो रिकॉर्ड में पिता की उपस्थिति को नियमित रूप से दर्शाना उचित नहीं है और इसे प्रशासनिक निष्पक्षता नहीं कहा जा सकता।
क्या है पूरा मामला
हाई कोर्ट ने कहा कि बच्ची की मां एकल अभिभावक और उसकी स्वाभाविक संरक्षक थी। मां ने बच्ची के पिता पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। बाद में, दोनों के बीच समझौता हो गया और यह तय हुआ कि बेटी मां की स्थायी कस्टडी में रहेगी। नाबालिग बच्ची और उसकी मां, दोनों याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि स्कूल रिकॉर्ड में पिता का उपनाम जारी रहना न केवल एक त्रुटि है, बल्कि उस बच्ची के लिए एक अनावश्यक सामाजिक असुरक्षा भी है। उस बच्ची को, जिसे समाज में बड़ा होना है, सीखना है और अपनी पहचान बनानी है, जहां अक्सर नामों को पारिवारिक इतिहास की पहचान माना जाता है।
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