मेहता ने कहा कि विवाह के अलावा इंसानी संबंधों का एक पूरा समूह है जो समाज में मौजूद है और कुछ केस में विवाह से भी ज्यादा मूल्यवान हो सकता है। सरकार ने याचिकाकर्ताओं की उन दलीलों को निराधार बताया जिसमें कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत शादी का मौलिक अधिकार मौजूद हैं। SG ने कहा कि अनुच्छेद 14 (समानता) या अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक) के तहत सभी प्रकार के सामाजिक रिश्तों को मान्यता देने की मांग का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता है। केंद्र ने कोर्ट को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी, जो समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने के मुद्दे को छुए बिना ऐसे जोड़ों की मानवीय चिंताओं को दूर करने के उपाय ढूंढेगी। इससे पहले 27 अप्रैल को कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि क्या समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए बगैर ऐसे जोड़ों को बैंक में संयुक्त खाता खुलवाने, भविष्य निधि में जीवन साथी नामित करने, ग्रेच्युटी और पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ दिया जा सकता है।
