सीमा पर रार की कहानी
जब कम्युनिस्टों चीन की सत्ता पर नियंत्रण किया तो सभी अंतरराष्ट्रीय करारों को एकतरफा होने के कान पर तोड़ दिया। चीन के साथ हमारी सीमा का निर्धारण सही तरीके से हुआ ही नहीं था। 1960 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो ने इसके लिए बातचीत की पहल की। इसी साल झाउ एन लाई और नेहरू के बीच संपर्क बना। बातचीत शुरू हुई। लेकिन 1962 में चीन ने पंचशील को तार-तार करते हुए हमारी पीठ में छुरा भोंक दिया। वास्तविक नियंत्रण रेखा वो लाइन है जहां तक दोनों देशों की आर्मी का नियंत्रण है। 3488 किलोमीटर लंबी सीमा तीन सेक्टरों में बंटी है- ईस्टर्न सेक्टर, मिडल सेक्टर और वेस्टर्न सेक्टर। चीन का दावा है कि भारत के साथ सीमा की लंबाई सिर्फ 2000 किलोमीटर है। पूर्वी सेक्टर का अलाइनमेंट मैकमोहन लाइन के साथ है। 1914 में ग्रेट ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के बीच शिमला समझौता हुआ था। 890 किलोमीटर बॉर्डर को ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच बांटने का काम सर हेनरी मैकमोहन ने किया। तवांग को ब्रिटिश इंडिया में माना गया। लेकिन चीन ने इसे गलत मानता है।बीजिंग में राव
जाने माने नौकरशाह श्याम शरण ने अपनी किताब How India Sees the World में लिखा है कि जब चीन के पीएम ली पेंग 1991 में दिल्ली आए तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बात हुई। फिर नरसिंह राव 1993 में बीजिंग गए। तब सीमा पर शांति के लिए ऐतिहासिक समझौता भी हुआ। इस बीच 1962 में चीन के हमले के बाद जमीन पर हालात बदल गए थे। नरसिंह राव के दौर पर भी एलएसी के किस थ्योरी को माना जाए, इस पर सहमति नहीं बनी। बस एलएसी शब्द का इस्तेमाल होता रहा।क्या है चीन का दावा?
चीन का नक्शा अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है। इसी दावे के सहारे चीन ने 2017 में छह स्थानों के नाम बदल दिए, 2021 में 15 जगहों के नाम बदले और कुछ दिन पहले 11 नाम फिर बदल दिए। हमने आधिकारिक तौर पर चीन के इस नामकरण संस्कार को वाहियात हरकत करार दिया है। अरुणाचल हमारी मातृभूमि का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा। दरअसल चीन की नजर तवांग पर है। 1962 के बाद पीएलए ने यहां पर पहली बड़ी हरकत 1986-87 में की थी। सुमदोरोंग चू इलाके में चीनी आर्मी की गुस्ताखी को जनरल के सुंदरजी ने नाकाम कर दिया था। तवांग के पास Yangzte पठार है जो 15 किलोमीटर लंबा और 10 किलोमीटर चौड़ा है। ये तवांग की सुरक्षा के लिए जरूरी है। यहां से हमारी आर्मी चीन के आर्मी पोजीशन पर हावी हो सकती है। तवांग छठे दलाई लामा की जन्मस्थली है। यही नहीं 14वें दलाई लामा जब चीन की प्रताड़ना से तंग आकर 1959 में भागे तो उन्होंने यहीं कदम रखा। क्या पता किसी अगले दलाई लामा का चयन भी तवांग से ही हो जाए। ये एक ऐसा धार्मिक चाबुक है जिसका असर चीन के भीतर तक हो सकता है।
