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ईवी खरीद रहे हैं तो इन खर्चो को भी जान लीजिए, कोई कार डीलर आपको नहीं बताएगा

Updated on 02-04-2025 01:17 PM
नई दिल्ली: इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) को लेकर लोगों में एक उम्मीद रहती है कि ये लम्बे समय में पैसे बचाएंगी। लेकिन, कुछ EV मालिकों का कहना है कि इसमें कुछ ऐसे छुपे हुए खर्चे भी होते हैं, जो इसे उम्मीद से ज़्यादा महंगा बना सकते हैं। देखने में तो इनकी कीमत ठीक लगती है, पर कुछ छुपे हुए खर्चों की वजह से बचत होने से पहले ही ये महंगी लगने लगती हैं।

उदित गोयनका ने बताया


एंजल इन्वेस्टर, उदित गोयनका ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर कुछ ऐसी ही बातें बताई हैं। उन्होंने X (पहले ट्विटर) पर लिखा कि गाड़ी खरीदने वाले लोग अक्सर इंस्टालेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्चों को नहीं समझ पाते। गोयनका ने कहा, "इन अनचाहे छुपे हुए खर्चों की वजह से आपको कम से कम 6,000 किलोमीटर चलने के बाद ही पैसे बचने शुरू होते हैं।"

कुछ खर्चे जो डीलर नहीं बताते


- एप्लीकेशन को जल्दी करवाने के लिए 10,000 रुपये।
- EV मीटर लगवाने के लिए 27,000 रुपये।
- चार्जर लगवाने के लिए 5,000 से 30,000 रुपये तक, जिसमें 10 मीटर से ज़्यादा दूरी होने पर 500 रुपये प्रति मीटर का चार्ज लगता है।
गोयनका ने आगे कहा, "ये EV इंस्टालेशन के वो छुपे हुए खर्चे हैं, जिनके बारे में कार डीलर आपको गाड़ी खरीदते समय नहीं बताते।"

एक और यूजर का छलका दर्द


उनकी इस बात पर एक यूज़र ने स्कूटर के बारे में भी ऐसी ही बात कही। उन्होंने कहा, "मैंने एक EV स्कूटी का हिसाब लगाया। एक Activa जो 1 लाख रुपये की है, वो 5 साल बाद फायदे में आएगी अगर उसे हर महीने 500 किलोमीटर चलाया जाए। EV स्कूटी पैसे बचाने के लिए ठीक नहीं है। इसका बस एक ही फायदा है कि आप पर्यावरण के बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन जो बिजली इस्तेमाल होती है वो शायद थर्मल पावर से आती है..."

EV इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें


इंस्टालेशन के खर्चों के अलावा, भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर भी EV मालिकों के लिए एक बड़ी समस्या है। देश में चार्जिंग स्टेशन बहुत कम हैं, बिजली की सप्लाई ठीक नहीं रहती, और चार्जिंग टेक्नोलॉजी में भी कोई स्टैंडर्ड नहीं है। इस वजह से लोग EV अपनाने से हिचकिचाते हैं। सरकार ने कुछ योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन चार्जिंग स्टेशन की कमी अभी भी एक बड़ी समस्या है। गांवों और छोटे शहरों में तो और भी दिक्कत है। वहां बिजली की सप्लाई ठीक नहीं रहती और इंफ्रास्ट्रक्चर भी ठीक से नहीं बना है। इसलिए EV रखना मुश्किल है। अलग-अलग राज्यों और प्राइवेट कंपनियों के बीच तालमेल भी ठीक से नहीं हो पा रहा है, क्योंकि कोई तय नियम नहीं हैं।

EV रखने के और भी खर्चे हैं


EV रखने के खर्चे इंस्टालेशन के बाद भी खत्म नहीं होते। चार्जिंग का खर्चा अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग होता है। बिजली की दरें और टाइम-ऑफ़-यूज़ प्लान बदलते रहते हैं, जिससे मालिकों को हर महीने का खर्चा पता नहीं चल पाता।

इसे उदाहरण से समझें


एक उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए आपने एक चमचमाती नई इलेक्ट्रिक गाड़ी खरीदी। डीलर ने आपको खूब सपने दिखाए कि कैसे आप पेट्रोल के खर्च से बचेंगे और पर्यावरण को भी साफ रखेंगे। लेकिन, जब आप गाड़ी लेकर घर पहुंचे, तो असली कहानी शुरू होती है। सबसे पहले तो आपको घर पर चार्जिंग स्टेशन लगवाना पड़ेगा। अब ये चार्जिंग स्टेशन क्या है? ये एक तरह का बिजली का सॉकेट है, जिससे आप अपनी गाड़ी को चार्ज करेंगे। लेकिन, ये सॉकेट लगवाना इतना आसान नहीं है। इसके लिए आपको बिजली कंपनी से परमिशन लेनी होगी, मीटर बदलवाना होगा और फिर एक इलेक्ट्रीशियन को बुलाकर चार्जिंग स्टेशन लगवाना होगा। इन सब में आपके 30-40 हज़ार रुपये तो आराम से लग जाएंगे।

फिर होगा लाखों का खर्चा


अब आप सोच रहे होंगे कि चलो, एक बार इतना खर्चा हो गया तो हो गया, बाद में तो बचत ही बचत है। लेकिन, ऐसा नहीं है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों में बैटरी होती है, जो कुछ सालों बाद खराब हो जाती है। इस बैटरी को बदलवाने में आपको 50 हज़ार से लेकर 2 लाख रुपये तक का खर्चा आ सकता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक गाड़ियों को सर्विसिंग की भी ज़रूरत होती है। हालांकि, पेट्रोल-डीजल गाड़ियों के मुकाबले इनकी सर्विसिंग थोड़ी सस्ती होती है, लेकिन फिर भी आपको हर साल कुछ हज़ार रुपये तो खर्च करने ही पड़ेंगे।

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