भारत का साथ दे रहा ईरान, देखते रह गए चीन-पाकिस्तान, इस बड़ी डील से दुनिया हैरान
Updated on
13-05-2024 12:17 PM
नई दिल्ली: भारत आज एक अहम डील करने जा रहा है। इस डील से चीन और पाकिस्तान की एक झटके में नींद उड़ने वाली है। भारत अगले 10 वर्षों के लिए चाबहार पोर्ट के प्रबंधन के लिए ईरान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहा है। व्यस्त चुनावी मौसम के बीच यह कदम को एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक पहुंच के रूप में माना जा रहा है, जिसके बड़े क्षेत्रीय प्रभाव होंगे। इससे साउथ एशिया से सेंट्रल एशिया के बीच ईरान के रास्ते एक नया ट्रेड रूट खिलेगा और पाकिस्तान के ग्वादर और कराची पोर्ट की अहमियत कम हो जाएगी। ग्वादर में चीन का निवेश है। इस तरह पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी इससे गहरा झटका लगेगा। पोर्ट, शिपिंग एंड वॉटरवेज मिनिस्टर सर्बानंद सोनोवाल इस समझौते पर हस्ताक्षर के लिए वायुसेना के एक विशेष विमान से ईरान रवाना हो गए हैं।
यह पहला मौका है जब भारत विदेश में किसी बंदरगाह का मैनेजमेंट सीधे तौर पर अपने हाथ में लेने जा रहा है। चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और बड़े यूरेशियन क्षेत्र के लिए भारत की प्रमुख संपर्क कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। इससे भारत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के साथ-साथ चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भी काउंटर करने में मदद मिलेगी। चाबहार को अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जोड़ने की योजना है जो भारत को ईरान के माध्यम से रूस से जोड़ता है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और अंततः मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान को बायपास करने में सक्षम बनाएगा।
टाइमिंग क्यों है खास
अप्रैल में विदेश मंत्रालय ने बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के सित्तवे बंदरगाह का संचालन संभालने के लिए इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि व्यस्त चुनावी मौसम में सोनोवाल का ईरान जाना इस समझौते के महत्व को दर्शाता है। भारत पिछले कई साल से इस डील के लिए मेहनत कर रहा था। इस समझौते से भारत को इस बंदरगाह को ऑपरेट करने का लाइसेंस मिल जाएगा। इस पोर्ट के विस्तार के लिए भारत ने पैसा दिया है। सोनोवाल की इस यात्रा का समय भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्चिम एशिया संकट के बीच हो रही है। इस संकट के कारण प्रमुख ट्रेड रूट्स प्रभावित हुए हैं। पिछले साल अगस्त में दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के बीच बातचीत में चाबहार का मुद्दा प्रमुखता से उठा था। बाद में नवंबर में जब उन्होंने गाजा संकट पर फोन पर बात की थी। साल 2016 में मोदी की ईरान यात्रा के दौरान चाबहार पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। 2018 में, जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रूहानी भारत आए तो बंदरगाह पर भारत की भूमिका बढ़ाने का मुद्दा प्रमुखता से उठा। जनवरी 2024 में जब विदेश मंत्री एस जयशंकर तेहरान में थे, तब भी यह मुद्दा उठा था। दोनों देशों के बीच नया दीर्घकालिक समझौता ओरिजनल डील की जगह लेगा। नया समझौता 10 वर्षों के लिए वैध होगा और ऑटोमैटिक तरीके से एक्सटेंड हो जाएगा।
मध्य एशिया तक पहुंचने की होड़
मूल समझौते में भारत को चाबहार बंदरगाह के Shahid Beheshti टर्मिनल को ऑपरेट करने की जिम्मेदारी मिली थी और इसे हर साल रिन्यू किया जाता है। भारत ने मई 2016 में इस टर्मिनल को विकसित करने के लिए ईरान और अफगानिस्तान के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे संसाधन संपन्न मध्य एशियाई देश हिंद महासागर क्षेत्र और भारतीय बाजार तक पहुंचने के लिए चाबहार का उपयोग करना चाहते हैं। यह बंदरगाह मध्य एशिया में बिजनस करने में दिलचस्पी रखने वाले भारतीय व्यापारियों और निवेशकों के लिए भी सुविधाजनक होगा। पाकिस्तान भी मध्य एशिया देशों पर डोरे डाल रहा है कि वे हिंद महासागर क्षेत्र तक पहुंचने के लिए कराची बंदरगाह का उपयोग करें। हालांकि, भारत का कहना है कि मध्य एशियाई देशों के लिए चाबहार ज्यादा आकर्षक प्रस्ताव होगा। आर्मेनिया भी INSTC के माध्यम से चाबहार बंदरगाह से जुड़ने का इच्छुक है।
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