बस एक हां का इंतजार... रिफाइनरी कंपनियों ने रोका रूसी तेल का ऑर्डर, बैन के बाद लिया एक्शन
Updated on
28-10-2025 04:21 PM
नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर बैन लगा दिया है। इन बैन का असर अब भारतीय रिफाइनरियों पर भी दिखने लगा है। सूत्रों के मुताबिक प्रतिबंधों के लागू होने के बाद से भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद के लिए कोई नया ऑर्डर नहीं दिया है। वे सरकार और तेल सप्लायर्स की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रही हैं।
कुछ रिफाइनरियां अपनी कच्चे तेल की जरूरतें पूरी करने के लिए खुले बाजार (स्पॉट मार्केट) का रुख कर रही हैं। रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल ने तेल खरीदने के लिए एक टेंडर जारी किया है। वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज ने खुले बाजार से तेल की खरीद बढ़ा दी है।
कई देशों ने लगाया बैन
यूरोपियन यूनियन (ईयू), यूके और यूएस ने रूस के यूक्रेन पर हमले के जवाब में उस पर कई तरह के बैन लगाए हैं। इनमें हाल ही में गुरुवार को अमेरिका द्वारा रूस के दो बड़े तेल उत्पादकों लुकोइल और रोसनेफ्ट पर लगाए गए नए बैन भी शामिल हैं।
बैन से दूर होगी बाधा
भारतीय रिफाइनरियां अमेरिका की के नए बैन का पालन करने के लिए रूसी तेल का आयात काफी कम करने की तैयारी में हैं। इससे अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक समझौते में एक बड़ी बाधा दूर हो सकती है। बता दें कि पिछले हफ्ते रूसी तेल के सबसे बड़े भारतीय खरीदार रिलायंस ने कहा था कि वह प्रतिबंधों का पालन करेगी, लेकिन अपने मौजूदा तेल सप्लायर्स के साथ संबंध बनाए रखेगी। रिलायंस कंपनी रोसनेफ्ट से तेल का आयात बंद करने की योजना बना रही है। सूत्र के मुताबिक रिलायंस ने अभी तक नए तेल के कार्गो के लिए ऑर्डर नहीं दिए हैं। साथ ही उन्होंने उन व्यापारियों से बुक किए गए कुछ ऑर्डर रद्द कर दिए हैं जिनके संबंध प्रतिबंधित संस्थाओं से थे। सूत्र ने बताया, 'हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी खरीद प्रतिबंधित संस्थाओं से जुड़ी न हो, क्योंकि बैंक भुगतान की सुविधा नहीं देंगे।'
कितनी आई गिरावट?
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार साल 2025 के पहले नौ महीनों में भारत ने 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन रूसी तेल खरीदा था, जो रूस के कुल निर्यात का 40% था। हालांकि व्यापारिक सूत्रों और शिपिंग डेटा के अनुसार अप्रैल से सितंबर के बीच भारत का रूसी तेल आयात पिछले साल की तुलना में 8.4% कम हुआ। इसके पीछे तेल की कीमतों में कम छूट और आपूर्ति में कमी को कारण बताया गया है। इस दौरान रिफाइनरियां मध्य पूर्व और अमेरिका से अधिक तेल खरीदने की कोशिश कर रही थीं।
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