अयोग्यता का मामला स्पीकर को देखने दीजिए, कोर्ट को नहीं... सिब्बल से बोला सुप्रीम कोर्ट
Updated on
15-02-2023 05:57 PM
नई दिल्ली: विधायकों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता याचिकाओं को तय करने के लिए संबंधित क्षेत्र अदालतों को पहला मंच बनाए जाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने असमति जताई। ये सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये फैसला स्पीकर को ही लेने दिया जाए।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व की ओर से पेश हुए थे कपिल सिब्बल कपिल सिब्बल उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ओर से पेश हुए, जिसकी सरकार पिछले जून में विद्रोह से गिरा दी गई थी। शिवसेना के उद्धव ठाकरे नीत गुट ने मंगलवार को कहा कि यह समय नबाम रेबिया और दसवीं अनुसूची के फैसले पर फिर से विचार करने का है, क्योंकि इसने तबाही मचा दी है। इस गुट ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया कि मामले को शीर्ष अदालत की सात-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा जाए।
नबाम रेबिया और 10वीं अनुसूची पर विचार करने की अपील फैसले ने स्पीकर की शक्ति को अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए प्रतिबंधित कर दिया, अगर उन्हें हटाने की मांग वाला एक प्रस्ताव लंबित था। ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट का प्रतिनिधित्व कर कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ से कहा, यह हमारे लिए नबाम रेबिया और 10वीं अनुसूची पर फिर से विचार करने का समय है, क्योंकि इसने कहर बरपाया है। उन्होंने कहा कि दसवीं अनुसूची को राजनीतिक नैतिकता के उद्देश्य की पूर्ति करने वाला माना जाता था, हालांकि अब यह इसे उलट रहा है।
उन्होंने जस्टिस एम.आर. शाह, कृष्ण मुरारी, हेमा कोहली और पी.एस. नरसिम्हा की पीठ से कहा कि आज दसवीं अनुसूची का सभी सरकारों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है और राजनीतिक अनैतिकता को आगे बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। दसवीं अनुसूची अपने राजनीतिक दल से निर्वाचित और नामित सदस्यों के दल-बदल को रोकने के लिए प्रदान करती है और इसमें दल-बदल के खिलाफ कड़े प्रावधान शामिल हैं। सिब्बल ने आगे जोर देकर कहा कि नबाम रेबिया मामले में निर्धारित कानून पर पुनर्विचार करने की भी जरूरत है।
शिंदे गुट पर गैरकानूनी तरीके से स्पीकर चुनने का लगाया आरोप दिनभर चली सुनवाई के दौरान उन्होंने दावा किया कि शिंदे गुट ने गैरकानूनी तरीके से एक विधानसभा अध्यक्ष नियुक्त किया जो ठाकरे गुट के खिलाफ पूरी तरह से पक्षपाती है। उन्होंने कहा कि रेबिया मामले में टिप्पणियों में असंवैधानिक परिणामों पर विचार करने में विफल रहे हैं, जो इस स्थिति से उत्पन्न हो सकते हैं कि एक अध्यक्ष अयोग्यता की कार्यवाही के साथ आगे नहीं बढ़ सकता है, यदि उसे हटाने का नोटिस लंबित है।
सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि इसने दल-बदल का पाप करने वाले संवैधानिक पापियों को बच निकलने का रास्ता दिया और कहा कि शिंदे गुट ने पिछले साल जून में एक नोटिस के माध्यम से डिप्टी स्पीकर को हटाने की मांग की, जो उस समय स्पीकर के कार्यो का प्रयोग कर रहे थे। अयोग्यता का गठन करने वाले कृत्यों को अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि शिंदे गुट द्वारा अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद अब तक विधानसभा में उपाध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव नहीं लिया गया है। शीर्ष अदालत बुधवार को शिंदे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की दलीलों पर बहस जारी रखेगी।
पिछले साल दिसंबर में दायर की गई थी याचिका पिछले साल दिसंबर में ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट से नबाम रेबिया मामले में फैसले को शीर्ष अदालत की सात-न्यायाधीशों की पीठ को संदर्भित करने के लिए कहा था। इस साल अगस्त में शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के गुट द्वारा दल-बदल, विलय और अयोग्यता से संबंधित प्रश्नों पर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।
शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संदर्भ आदेश में पहला मुद्दा तैयार किया था कि क्या स्पीकर को हटाने का नोटिस उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही जारी रखने से रोकता है। शिंदे और अन्य विधायकों द्वारा उनके खिलाफ बगावत करने और उन्हें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद ठाकरे को एक बड़ा झटका लगा। उन्होंने शिवसेना पार्टी और उसके चुनाव चिह्न् पर भी अपना दावा पेश किया।
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