दादी इंदिरा के बाद गांधी परिवार से राहुल गांधी ऐसे दूसरे शख्स हैं जिनकी लोकसभा सदस्यता छिनी है। वैसे तो सोनिया गांधी को भी एक बार इस्तीफा देना पड़ा था। 2006 में सोनिया रायबरेली सीट से सांसद होने के साथ-साथ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष भी थीं। तब 'लाभ के पद' का विवाद उठा जिसके बाद उन्होंने नैतिकता के आधार पर संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद रायबरेली में उपचुनाव हुआ जिसमें सोनिया एक बार फिर जीतकर संसद पहुंचीं। खैर, बात इंदिरा की सांसदी छिनने की। इंदिरा गांधी की तो एक नहीं, दो बार संसद सदस्यता छिनी थी। पहली बार 1971 के चुनाव में धांधली के आरोप में। तब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट का ये फैसला जून 1975 में आया जिसके बाद उन्होंने इमर्जेंसी का ऐलान कर दिया था। इसी तरह, 1978 में हुआ। कर्नाटक की चिकमंगलूर संसदीय सीट पर उपचुनाव हुआ और इंदिरा गांधी वहां से जीत गईं। लेकिन एक महीने के भीतर ही उनकी सदस्यता चली गई। तब केंद्र में उनके प्रतिद्वंद्वी मोरार जी देसाई की अगुआई में सरकार थी। देसाई ने उनके खिलाफ संसद के भीतर चक्रव्यूह रचा। इंदिरा पर आरोप लगा कि प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने सरकारी अफसरों का अपमान किया। उनपर संसद की अवमानना का भी आरोप लगा और जांच विशेषाधिकार समिति को सौंप दी गई। विशेषाधिकार समिति ने उन्हें विशेषाधिकार हनन और संसद की अवमानना का दोषी पाया। सजा क्या हो इसका फैसला संसद की सामूहिक चेतना पर छोड़ दिया गया। मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता रद्द करने और उस वक्त चल रहे संसद सत्र की पूरी अविधि के दौरान उन्हें जेल में डालने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव पास हो गया। पक्ष में 279 तो विपक्ष में 138 वोट मिले। 37 सांसद वोटिंग के समय गैरहाजिर रहे। इस तरह दूसरी बार इंदिरा गांधी को संसद सदस्यता गंवानी पड़ी। तब भी कांग्रेस ने काफी आक्रामक तेवर अपनाए थे और 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुआई में पार्टी ने जबरदस्त वापसी की थी। अब देखना ये है कि राहुल गांधी की सदस्यता छिनने के बाद गुस्से से लाल गांधी परिवार 2024 में इंदिरा का 1980 वाला करिश्मा दोहरा पाता है या नहीं।
