सियासी जानकार मान रहे हैं कि क्षेत्रीय नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। वे पीएम कैंडिडेट पर स्पष्ट स्थिति चाहते हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में कुछ दल शायद इसलिए भी पत्ते न खोल रहे हों क्योंकि वे राहुल गांधी के नाम पर सहमत न हों। वैसे कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से पीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया है लेकिन कई बार कांग्रेसी नेता राहुल का नाम उछाल चुके हैं। विपक्षी दल भी जानते हैं कि कांग्रेस की सीटें भले न हों, पर उपस्थिति और जनाधार पूरे देश में है। विचारधारा का मसला है जिस पर विपक्ष बंट सकता है लेकिन उसे मालूम है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए एकजुट होना होगा।
ममता बनर्जी के नेता उन्हें पीएम का दावेदार मानते हैं। ममता ने कई राज्यों में पार्टी का विस्तार करना शुरू किया है। उन्हें शायद लगता हो कि अगर ज्यादा राज्यों में टीएमसी का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो उनकी दावेदारी मजबूत दिख सकती है। शायद इसीलिए ममता कांग्रेस के साथ आने में देर कर रही हैं। शरद पवार को भी कुछ लोग पीएम कैंडिडेट मानते हैं लेकिन उनका झुकाव कांग्रेस के पक्ष में है। के. चंद्रशेखर राव की गहमागहमी ने भी उनकी महत्वाकांक्षा को लेकर कई सवाल पैदा किए थे। हालांकि उनकी राह आसान नहीं। अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ मिलकर यूपी चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन अभी उन्होंने चुप्पी साध रखी है। आम आदमी पार्टी का दिल्ली, पंजाब, गोवा में प्रभाव बढ़ने के बाद से अरविंद केजरीवाल को भी पीएम कैंडिडेट प्रोजेक्ट करने की कोशिशें हुई हैं।
शायद विरोधी दलों की इसी उलझन को भांपते हुए कांग्रेस पीएम कैंडिडेट पर फैसला चुनाव टालना चाहती है। तब सीटों की संख्या के हिसाब से बहुत चीजें अपने आप साफ हो जाएंगी।
