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बस योगी-हिमंत जैसे CM ही बचा पाएंगे! BJP के लिए कर्नाटक हार का फलादेश समझिए

Updated on 15-05-2023 07:21 PM
आसिम अली, नई दिल्ली: कर्नाटक चुनाव (Karnataka Election) के नतीजे सबके सामने है, इस चुनाव में बीजेपी (BJP) की करारी हार हुई है तो वहीं कांग्रेस (Congress) पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। कर्नाटक के जो नतीजे आए हैं उससे बीजेपी और कांग्रेस के लिए क्या सबक है। शुरुआत बीजेपी से। 2014 से शुरू होने वाला दशक निर्विवाद रूप से पार्टी के लिए सबसे सफल चुनावी समय रहा है। हालांकि इस चुनावी रिकॉर्ड में कई खामियां दिखाई पड़ती हैं। अपवाद के तौर पर यदि असम और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी अपने मुख्य राजनीतिक क्षेत्र से परे राज्यों को जीतने में असमर्थ है। बड़े भारतीय राज्यों में बीजेपी के बेहतर चुनावी संसाधनों और एक लोकप्रिय राष्ट्रीय नेतृत्व (Popular National Leadership) के बावजूद विपक्षी सरकारों की संख्या बीजेपी की तुलना में काफी अधिक है। यह समस्या बीजेपी और कमजोर राज्य इकाइयों, या एक शक्तिशाली पीएम और अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल सीएम के बीच बेमेल संबंध है। कर्नाटक इसका एक अच्छा उदाहरण है कि यह कैसे बीजेपी की राज्य संभावनाओं को नीचे की ओर से ले जा सकता है।
यूपी और असम के मुख्यमंत्री अलग क्यों
जहां बीजेपी के कमजोर मुख्यमंत्री है वहां प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की आवश्यकता है, जैसा कि हमने पिछले दो वर्षों में कई चुनावों में देखा है। यह एक अपवाद नहीं, एक आदर्श बन गया है। (गुजरात, त्रिपुरा, उत्तराखंड) में एक या दो साल पहले नेतृत्व परिवर्तन होता है लेकिन यह रणनीति हमेशा काम नहीं करती है। इसके अलावा एक और मॉडल है यूपी और असम का। भाजपा के मुख्यमंत्री काफी हद तक यहां बिना किसी दबाव के काम करते हैं और लोकप्रिय हैं। हिंदुत्व वाली लाइन पर चलते हुए कानून व्यवस्था और लव जिहाद पर योगी आदित्यनाथ और अवैध घुसपैठ पर हिमंत बिस्वा सरमा। इसका नतीजा है कि इन्होंने विपक्षी दलों को हाशिए पर डाल दिया है। इसकी तुलना बोम्मई से करें, जिन्हें राज्य के हिंदुत्ववादी गुट के लगातार हमलों का सामना करना पड़ा।
मुख्यमंत्री पर अपनी ही पार्टी की ओर से हमला
जैसा कि राजनीतिक वैज्ञानिक Harold Gould ने 1997 में कर्नाटक पर लिखा था जब किसी मुख्यमंत्री पर उसकी अपनी पार्टी के सहयोगियों द्वारा नियमित रूप से हमला किया जाता है तो लोगों के विपक्ष के दावों पर विश्वास करने की अधिक संभावना होती है। भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के तरीकों पर सवाल खड़े होने लगते हैं। CSDS-NDTV पोल के सर्वे पर गौर करें। 63% ने राज्य सरकार के प्रदर्शन से संतुष्ट होने का दावा किया, जबकि 32% ने असंतुष्ट होने की बात कही। इसी सर्वे ने मुख्यमंत्री की अलोकप्रियता को भी दिखाया।

कांग्रेस की रणनीति जिससे मिली कामयाबी
अब आते हैं कांग्रेस पर। कांग्रेस की दो रणनीति थी। एक, भ्रष्टाचार के आरोपों पर बोम्मई सरकार को गलत ठहराना और सरकार पर हमला करना। दूसरा सिद्धारमैया और शिवकुमार खेमे के बीच गुटबाजी के खतरे को रोकना। अपनी चुनावी रणनीतियों को लागू करने की कांग्रेस की क्षमता हाल के दिनों में सवालों के घेरे में रही है। हालांकि, कर्नाटक में, पार्टी की रणनीति शुरू से ही स्पष्ट थी। कांग्रेस के लिए पहला सबक था राज्य नेतृत्व और संगठन का महत्व। आखिरकार, चुनावी श्रेय का बड़ा हिस्सा कर्नाटक राज्य संगठन और उसके नेतृत्व को जाता है जिसने अभियान को आगे बढ़ाया।
कर्नाटक ने दिखाया आलाकमान को कैसे काम करना चाहिए
अतीत में देखा जाए तो कांग्रेस भ्रष्टाचार की धारणाओं का राजनीतिकरण करने और चुनावी बदलाव को प्रभावित करने में बार-बार विफल रही है। विपक्ष की ओर से बार-बार इस पर नजर रखने की जरूरत होती है। 1967 से पहले की राष्ट्रीय कांग्रेस में राज्य इकाइयों की संरचना अलग तरह की थी। स्टेट यूनिट मजबूत हुआ करती थी। इसे वापस हासिल करने का प्रयास किया जाना चाहिए। दूसरा, कर्नाटक दर्शाता है कि एक आलाकमान को कैसे काम करना चाहिए, राज्य इकाइयों का गला घोंटना नहीं बल्कि प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करना।

पहली चुनौती पार, असली परीक्षा अभी बाकी है

मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी पहली बड़ी चुनौती को चतुराई से पार किया। राष्ट्रीय मुद्दों से बड़े पैमाने पर परहेज करते हुए, 'पांच गारंटी' वाले कार्यक्रम पर जोर दिया। भारत जोड़ो यात्रा ने कोई प्रत्यक्ष चुनावी प्रभाव डाला ऐसा नहीं क्योंकि कांग्रेस ने राज्य स्तर के मुद्दों पर लड़ाई लड़ी थी। फिर भी, यात्रा के बाद राज्य में पार्टी और मजबूत हुई। कर्नाटक में खरगे का मैनेजमेंट और 'दूरदर्शी' गांधी परिवार के बीच कांग्रेस नेतृत्व को सुव्यवस्थित करने ने अच्छा काम किया है। लेकिन याद रखें, अगले चार बड़े राज्यों के चुनावों में कांग्रेस को कहीं अधिक कठिन मुकाबलों का सामना करना पड़ेगा। इन्हीं राज्यों में आलाकमान के नए ढांचे की सही मायने में परीक्षा होगी।

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