- आगे और बर्फबारी होनी थी मगर जनरल थिमाया ने 1 नवंबर की तारीख मुकर्रर कर दी। मौसम चाहे जैसा हो, सेना को अगला हमला उसी दिन करना था। आर्मी वेबसाइट पर ले. जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो' को क्रेडिट दिया गया है जिन्होंने यह चुनौती स्वीकारने में पलभर की भी हिचक नहीं दिखाई। सेना के अनुसार, अब अगर देर की जाती तो लेह और लद्दाख भारत के हाथ से निकल जाता।
- 1 नवंबर 1948 की दोपहर 2.40 बजे तक टैंक घुमरी बेसिन तक पहुंच चुके थे। उनके पीछे (रॉयल) गोरखा की एक टुकड़ी थी। 1 पटियाला और 4 राजपूत के सैनिक दुश्मनों को उनके ठिकानों से निकाल-निकाल कर मार रहे थे। इतनी ऊंचाई पर टैंक देखकर दुश्मन के होश उड़ गए। आर्टिलरी यूनिट्स ने धुआं-धुआं कर दिया था। आर्मी रेकॉर्ड्स के अनुसार, दुश्मन जान बचाने को इधर-उधर भागा।
- जनरल थिमाया ने हुक्म दिया कि कुछ किलोमीटर दूर स्थित मचोई पर फोकस किया जाए। उसी रात 1 पटियाला के सैनिक वहां पहुंच गए। एक बार फिर वही नजारा था। जान बचाकर भागता दुश्मन इस बार एक होवित्जर पीछे छोड़ गया।
- माइनस 20 डिग्री तापमान था, बर्फीले तूफान के बीच दुश्मन की पोजिशंस पर टैंक से हमला करना, वह भी बिना प्रॉपर क्लोदिंग और इक्विपमेंट के... दुनिया में कोई सेना इससे पहले ऐसा नहीं कर सकी थी। भारतीय सेना इसमें सफल रही। 4 नवंबर तक सेना जोजिला पास से सिर्फ 18 किलोमीटर दूर रह गई थी।
- आगे ऊंचाई पर दुश्मन मौजूद था। एक बार फिर टैंकों की मदद से उन्हें खदेड़ा गया। 15-16 नवंबर तक सेना द्रास पर कब्जा कर चुकी थी। 17-18 नवंबर को सेना ने करगिल की तरफ कूच किया। 22-23 नवंबर तक करगिल के रास्ते में मौजूद हर दुश्मन का सफाया कर दिया गया।
सेना के अनुसार, 5 गोरखा की एक कंपनी ने 4000 मीटर से ज्यादा ऊंची पहाड़ी चढ़ी। इसी बटालियन की एक और कंपनी ने शिंगो नदी पार की और दुश्मन पर दूसरी तरफ से हमला बोल दिया। उसी दिन, लेह से निकली टुकड़ी ने करगिल में लिंक-अप पूरा किया। लेह से श्रीनगर के बीच से दुश्मन का सफाया हो चुका था।
