पतंजलि की नाक में तो दम हो गया, लेकिन वाहियात विज्ञापनों से अटी पड़ी है फार्मा इंडस्ट्री, उसकी सुध कौन लेगा
Updated on
02-05-2024 01:46 PM
साक्ष्य-आधारित दवाइयां तीन स्तंभों के आधार पर बनाए जाती हैं- रोगी की पसंद, डॉक्टर अनुभव और हालिया उपलब्ध साक्ष्य। गलत सूचना इन तीनों को कमजोर करती है और यही बात सुप्रीम कोर्ट में चल रहे पतंजलि के मामले को क्रिटिकल बनाती है। इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने कहा कि उसने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनी दिव्य फार्मेसी के 14 उत्पादों के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि यह कार्रवाई तब की गई जब सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए राज्य प्राधिकरण की तीखी आलोचना की।
नवंबर 2023 में, पतंजलि ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह अब अपने अपने उत्पादों के विज्ञापन या ब्रांडिंग में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं करेगी। साथ ही दवा के असर का दावा करने वाले या किसी भी चिकित्सा प्रणाली के खिलाफ कोई भी किसी भी रूप में मीडिया को जारी नहीं किया जाएगा। लेकिन कंपनी ने भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करना जारी रखा। इनमें उच्च रक्तचाप और मधुमेह सहित कई हेल्थ कंडीशंस के इलाज का झूठा वादा किया गया और साथ ही पश्चिमी चिकित्सा की विफलताओं की आलोचना भी की। इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया था। कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले उत्पादों के विज्ञापन प्रकाशित करना जारी रखा था जबकि नवंबर में उसने कोर्ट को अंडरटेकिंग दी थी। इसके बाद पतंजलि को प्रमुख समाचार पत्रों में बिना शर्त माफी भी प्रकाशित करनी पड़ी।
पतंजलि से आगे
पतंजलि के विज्ञापनों में यह भी दावा किया गया है कि उन्होंने शोध के माध्यम से अपने फॉर्मूलेशन की प्रभावकारिता को साबित किया है। ऐसे कई शोध उद्धरणों के साथ समस्या यह है कि इनमें जरूरी शर्तों का अभाव है और यह विभिन्न बीमारियों के 'इलाज' के दावों को साबित करने के लिए नाकाफी हैं। इस खास फार्मा उद्योग में पेटेंट और मालिकाना दवाओं से जुड़ी समस्या है। इन फॉर्मूलेशन का उल्लेख आयुर्वेद की शास्त्रीय पाठ्यपुस्तकों में नहीं किया गया है लेकिन इनमें अलग-अलग मात्रा और संयोजन में बताए गए तत्व शामिल हैं। साथ ही फॉर्मूलेशन का लाइसेंस देने के लिए विभिन्न राज्य प्राधिकरणों द्वारा निर्धारित सुरक्षा और प्रभावकारिता मानक भी बहुत कड़े नहीं हैं।
शास्त्रीय आयुर्वेद की पाठ्यपुस्तकों में सीधे दर्ज किए गए फॉर्मूलेशन में भारी मात्रा में धातु और अन्य संभावित विषाक्त अवयवों की मौजूदगी के कारण इनकी सेफ्टी पर पहले से ही बहस चल रही है। नए फॉर्मूलेशन को बाजार में लाने से पहले विश्वसनीय डेटा की आवश्यकता होती है। हाल में यूपी ने 30 से अधिक आयुर्वेद उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसकी वजह यह थी कि इनमें से कई उत्पादों में स्टेरॉयड, दर्द निवारक और ओरल हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट पाए गए थे। पब्लिक हेल्थ के लिए आगे के जोखिम से बचने के लिए आयुर्वेद प्रतिष्ठान को नकली और मिलावटी उत्पादों के मुद्दे पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
आयुर्वेद से आगे
यह समस्या सिर्फ आयुष क्षेत्र तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में फार्मा उद्योग में व्यावसायिक हितों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने वाले कई मामले सामने आए हैं। केवल पतंजलि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इस बहस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कुछ ऐसे हालिया मामलों पर विचार करें जो उद्योग और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संघर्ष को उजागर करते हैं। ब्रिटिश-स्वीडिश बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने हाल ही में अदालती दस्तावेजों में स्वीकार किया कि उसके कोविड वैक्सीन से एक दुर्लभ दुष्प्रभाव थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (Thrombosis with thrombocytopenia syndrome) हो सकता है। टीटीएस रक्त के थक्के बना सकता है जो डीप वेन थ्रोम्बोसिस, दिल के दौरे और स्ट्रोक का कारण बन सकता है। यह दुष्प्रभाव सभी एडेनोवायरस वेक्टर-आधारित टीकों के लिए जाना जाता है। कई देशों ने इसका पता चलते ही इन टीकों को रोक दिया या एज-रेस्टिक्टेड कर दिया।
इसी तरह यूके की एक अथॉरिटी ने हाल ही में फैसला दिया कि फाइजर ने ट्विटर पर अपनी बिना लाइसेंस वाली कोविड वैक्सीन का प्रचार किया लेकिन इसके साइड-इफेक्ट्स के बारे में कुछ भी नहीं बताया। इस कंपनी पर यूके में जुर्माना लगाया गया। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी को गहरा खेद है और वह अथॉरिटी के फैसले में उठाई गई बातों से पूरी तरह वाकिफ है और इसे स्वीकार करती है। तीसरा उदाहरण जिसे हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का ध्यान जाना चाहिए, वह यह है कि यूरोपीय संघ के खाद्य सुरक्षा एजेंसियों ने भारत से निर्यात किए जाने वाले 500 से अधिक खाद्य उत्पादों में कैंसर पैदा करने वाले एथिलीन ऑक्साइड की उपस्थिति का खतरा बताया है।
टाइटन पर काबू
इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देती है लेकिन वाणिज्यिक हितों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। इंडस्ट्री किसी भी हालत में हेल्थ को हल्के में नहीं ले सकती है। चुनावी बॉन्ड का डेटा दवा उद्योग और राजनीतिक दलों के बीच संभावित सांठगांठ की ओर इशारा करता है। जीवनशैली में बदलाव, शारीरिक गतिविधि और डायटरी मॉडिफिकेशन से जुड़ी नॉन-फार्मा गतिविधियों की तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता है क्योंकि कोई उनका प्रचार नहीं करता है।
अब साक्ष्य-आधारित दवाओं की अवधारणा पर वापस आते हैं। भारत में, यह इसलिए कमजोर है क्योंकि स्वास्थ्य सेवा के बारे में मरीज की पसंद आमतौर पर अक्सर गलत सूचना से प्रेरित होती है। यह सोशल मीडिया पर व्याप्त है। साथ ही गरीबी और अशिक्षा की भी इसमें अहम भूमिका है। आयुष और आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र अलग-अलग काम करते हैं, जिससे इन्फॉर्म्ड चॉइस लगभग असंभव हो जाती है। यह दावा करना की आयुष का कोई दुष्प्रभाव नहीं है और इससे पूरा इलाज होता है, सही नहीं है। डॉक्टर इसकी सीमाओं के बारे में नहीं बताते हैं। इसने जनता को गुमराह किया है और नुकसान पहुंचाया है। आयुष प्रतिष्ठान को परिणामों को बेहतर बनाने के लिए 'लोकप्रियता' पर 'साक्ष्य निर्माण' को प्राथमिकता देनी चाहिए। सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य के बारे में प्रामाणिक जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन यही एकमात्र उपाय है।
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