पंडित और बैंड वालों सावधान! राजस्थान में आखा तीज पर प्रशासन सख्त, बाल विवाह में शामिल हुए तो होगी जेल
Updated on
17-04-2026 12:17 PM
जयपुर: राजस्थान में खुशियों और 'अबूझ सावे' का प्रतीक मानी जाने वाली अक्षय तृतीया पर इस बार प्रशासन का पहरा बेहद सख्त रहने वाला है। सदियों से चली आ रही बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को जड़ से मिटाने के लिए प्रदेश सरकार ने कमर कस ली है। गृह विभाग ने इस बार ऐसा 'एक्शन प्लान' तैयार किया है कि शादी कराने वाले पंडित हों या खाना बनाने वाले हलवाई, जरा सी चूक हुई तो सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी। इस बार अक्षय तृतीया रविवार 19 अप्रैल को है।
हलवाइयों से लिए जाएंगे शपथ पत्र
प्रशासन ने इस बार केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि 'जवाबदेही' का नया फॉर्मूला अपनाया है। गृह विभाग के निर्देशों के अनुसार, अब शादी के निमंत्रण पत्र (कार्ड) पर दूल्हा और दुल्हन की जन्मतिथि और उम्र का उल्लेख करना अनिवार्य कर दिया गया है। इतना ही नहीं, प्रशासन ने शादी से जुड़े हर व्यापारिक पक्ष पर नकेल कस दी है। हलवाई, बैंड वाले, पंडित, टेंट हाउस संचालक और ट्रांसपोर्टर्स से लिखित शपथ पत्र लिए जा रहे हैं। यदि किसी ने भी बाल विवाह में अपनी सेवाएं दीं, तो उन पर कानूनी शिकंजा कसा जाएगा और उनका लाइसेंस भी रद्द हो सकता है।
कलेक्टर-एसपी को मिली सीधी जिम्मेदारी
सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी जिले में बाल विवाह होने पर वहां के जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) सीधे तौर पर जवाबदेह होंगे। हर जिले में 24 घंटे सक्रिय रहने वाले कंट्रोल रूम स्थापित कर दिए गए हैं। पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय पुलिस की टीमें सक्रिय रहेंगी। यदि कहीं भी बाल विवाह की भनक लगती है, तो आमजन 1098, 181 या 100 नंबर पर शिकायत कर सकते हैं। शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाएगी।
क्यों आखा तीज ही है सबसे बड़ी चुनौती?
राजस्थान में अक्षय तृतीया को 'अबूझ सावा' माना जाता है, जिसमें मुहूर्त निकलवाने की जरूरत नहीं होती। ग्रामीण इलाकों में आर्थिक तंगी और अशिक्षा के कारण लोग इसी दिन बच्चों की शादियां कर देते हैं, ताकि एक ही पंडाल और एक ही खर्च में घर के कई बच्चों का ब्याह निपटाया जा सके। पीपल पूर्णिमा पर भी इसी तरह का खतरा बना रहता है।
जागरूकता की भी अलख: डंडे के साथ समझाइश
सरकार का मानना है कि केवल कानून से नहीं, बल्कि सोच बदलने से यह प्रथा रुकेगी। बच्चों को बाल विवाह के शारीरिक और मानसिक दुष्परिणामों के बारे में पढ़ाया जा रहा है। पंचायतों को निर्देश दिए गए हैं कि वे ग्रामीणों को बाल विवाह के खिलाफ सचेत करें और संकल्प दिलाएं।
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