वो गन्ने तोड़कर प्रैक्टिस करती थी, जश्न में डूबे मेरठ की गोल्डन गर्ल अन्नू रानी की कहानी
Updated on
05-10-2023 03:12 PM
संदीप राय/कृष्णा चौधरी, मेरठ: बमुश्किल 15 किमी की दूरी पर स्थित मेरठ जिले के दो गांव जश्न में डूब गए, क्योंकि उनकी दो बेटियों ने एशियन गेम्स में कमाल कर दिया। इकलौता गांव की पारुल चौधरी और बहादुरपुर गांव की अन्नू रानी ने चीन में चल रहे एशियाई खेलों में क्रमशः महिलाओं की 5,000 मीटर दौड़ और भाला फेंक स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता। दोनों एथलीटों को यहां तक पहुंचने के पीछे लंबा संघर्ष है। दोनों को अपने रिश्तेदारों और गांव के बुजुर्गों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जो महिलाओं को 'मर्दाना खेलों' में शामिल होने से नाराज थे। हालांकि, अब लोगों की सोच बदल चुकी है और महिलाओं को प्रोत्साहित भी कर रहे हैं।
लोग थे खिलाफ, लेकिन हम खड़े रहे उनके पिता अमरपाल सिंह ने बुधवार को कहा- अन्नू (रानी) ने इन हिस्सों में लोगों के सोचने के तरीके को बदल दिया है जब उसने भाला फेंक इवेंट में हिस्सा लेने का फैसला किया तो यह आसान नहीं था। लोग पहले तो अविश्वासी थे। लोग इन खेलों में महिलाओं के हिस्सा लेने के खिलाफ थे, लेकिन हम उसके साथ खड़े रहे। मैं अक्सर ट्रेनिंग के लिए उसके साथ जाता था।
खेत में होने पर गन्ने के साथ करती थी अभ्यास 31 वर्षीय रानी को खेल में ले आने का श्रेयस उनके भाई उपेन्द्र सिंह को जाता है, जिन्होंने 2009 में उनका अभ्यास शुरू करवाया। उपेन्द्र बताते हैं- उसने अपने कोच को सही साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब वह स्टेडियम में नहीं होती थी, तो वह अपने परिवार के खेत में गन्ने के साथ अभ्यास करती थी, जिससे गांव वाले उसका मजाक उड़ाते थे। लेकिन उसने कोई ध्यान नहीं दिया।
गांव के लिए हीरो हैं, देखकर कई युवा बने एथलीट आरजू नेहरा, जो रानी के गांव से हैं और उनसे भाला फेंकने के लिए प्रेरित हुए थे, ने बताया- जब तक मैंने अन्नू दीदी को खेलते नहीं देखा था, तब तक मुझे एक खेल के रूप में भाला फेंकने के बारे में पता नहीं था। उनकी प्रेरणा से मैंने राज्य स्तर पर गोल्ड और सिल्वर, जबकि नेशनल लेवल पर ब्रॉन्ज मेडल जीता। नेहरा ने कहा- आज पूरा गांव उनकी सफलता को सेलिब्रेट कर रहा है, लेकिन शुरुआती दिनों में किसी को भी इसकी परवाह नहीं थी कि वह अपनी तैयारी कैसे कर रही थी। इसके बजाय उनकी आलोचना की गई।
पारुल की ऐसी है कहानी, छिपकर करना पड़ा अभ्यास 28 साल की पारुल चौधरी के साथ भी ऐसी ही कहानी थी। उन्हें गांव में इतने कठिन समय का सामना करना पड़ा कि उन्होंने छिपकर प्रशिक्षण लिया और कई बार छोड़ने के बारे में सोचा। पारुल की मां राजेश देवी ने कहा- हर समय ताने मिलते रहते थे। मुझे आस-पड़ोस के सभी सामाजिक रिश्ते तोड़ने पड़े। पारुल को प्रेरित रखने के लिए उसे अभ्यास सत्र के लिए बाहर ले जाना मेरे लिए कठिन था। लेकिन इसका सब कुछ सुखदाई रहा। आज मेरी बेटी एक आइकन है। पारुल के कोच गौरव त्यागी ने बताया, 'अक्सर पारुल स्टेडियम में दुखी होकर आती थी। पूछने पर वह हमेशा कहती थी, 'मेरे गांव वाले मुझे निराश करते हैं।' मैंने उसे यह कहकर प्रेरित किया कि एक दिन वह गले में सोना पहनकर इन्हीं ग्रामीणों के बीच से गुजरेगी। वह दिन आ गया।
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