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थरूर, स्वामी, अब्दुल्ला... आखिर करगिल का जख्म देने वाले मुशर्रफ कुछ के लिए 'हीरो' कैसे हो गए?

Updated on 06-02-2023 05:36 PM
नई दिल्ली: अपने देश में एक कहावत है कि निधन के बाद व्यक्ति की अच्छी बातों को याद किया जाता है, पर क्या परवेज मुशर्रफ जैसा शख्स 'हीरो' हो सकता है? जैसे ही दुबई से पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति के निधन की खबर आई, भारत में भी चर्चा होने लगी। करगिल का जख्म देने वाले उस तानाशाह को विलेन के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा लेकिन कांग्रेस नेता शशि थरूर, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला कुछ अलग ही बातें कह रहे हैं। थरूर ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति के बारे में कहा कि कभी भारत के कट्टर दुश्मन रहे मुशर्रफ 2002-2007 (मतलब करगिल के बाद) शांति के पक्षधर बन गए थे। भाजपा को यह पसंद नहीं आया और उसने कांग्रेस पर 'पाकिस्तान परस्त' होने का आरोप लगाया। स्वामी ने भी दुख जताया तो उनके ट्वीट पर लोग नाराज हो गए। उमर अब्दुल्ला ने मुशर्रफ से हाथ मिलाते हुए एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि मैं हमेशा उन्हें एक पाकिस्तानी नेता के तौर पर याद करूंगा। ऐसे में सवाल पूछे जाने चाहिए कि क्या करगिल का दर्द भुला दिया गया, क्या मुशर्रफ अब विलेन से 'हीरो' की भूमिका में आ जाएंगे, उन परिवारों को आप क्या जवाब देंगे जिनका लाल उस लड़ाई में शहीद हो गया?

भारत की पीठ में खंजर था करगिल युद्ध

आम इंसान अपने पीछे परिवार, संपत्ति और अच्छे-बुरे काम छोड़कर जाता है। अच्छाइयों को जनता याद करती है लेकिन बुरे लोगों के दामन पर लगे दाग मौत के बाद भी नहीं धुलते। यह जानते हुए कि पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ ही 1999 की करगिल लड़ाई के मास्टरमाइंड थे, क्या कोई भारतीय उन्हें हीरो मानेगा? उनमें लाख अच्छाइयां हों, उनका परिवार याद करे लेकिन जिस समय भारत ने पाकिस्तान से मित्रता का हाथ बढ़ाया उस समय पीठ में खंजर खोपने वाले जनरल को हम हमेशा विलेन ही मानेंगे। यह कहना कि उन्हें बाद में एहसास हो गया था कि पाकिस्तान में स्थिरता के लिए भारत के साथ अच्छे संबंध रखने होंगे, एक ऐसा सामान्य तर्क है जो सियासत में अक्सर गढ़ा जाता है। कुछ वैसा ही, जैसे आप एक नेता को किसी दूसरी पार्टी में जाते हुए सुनते हैं कि मेरी 'अंतरात्मा' जाग उठी। मुशर्रफ ने 1999 में सैन्य तख्तापलट कर नवाज शरीफ सरकार को गिरा दिया था। 9 साल शासन करने वाले मुशर्रफ बाद में भारत आए, हमने उन्हें पकवान भी परोसे लेकिन वो जख्म कभी भुलाया नहीं जा सका।
जब भी शहीदों का परिवार अपने जिगर के टुकड़े की तस्वीर देखेगा, मुशर्रफ का क्रूर चेहरा उनके सामने आएगा। मुशर्रफ के निधन पर भावुक होने वाले नेताओं को समझना चाहिए कि जिस शख्स ने अपनी जन्मभूमि का भी ख्याल नहीं रखा, वह गुड मैन कैसे हो सकता है। भारत के लोग दुनिया में कहीं भी बस जाएं पर अपने जन्मस्थान को कभी नहीं भूलते और ताउम्र अच्छी भावनाएं ही उमड़ती हैं। मुशर्रफ का जन्म बंटवारे से पहले दिल्ली में 11 अगस्त 1943 को हुआ था। उन्होंने 4 साल यहीं पर बिताए। बाद में परिवार कराची में बस गया। लेकिन युद्ध छेड़ने से पहले मुशर्रफ को दिल्ली की वो पुरखों की हवेली भी याद नहीं आई।

सुब्रमण्यम स्वामी को इतना दुख हुआ
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने लिखा, 'पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ का निधन मेरे जैसे उन लोगों के लिए दुखद है जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे। वह तख्तापलट के जरिए पाकिस्तान की सत्ता में आए लेकिन भारत के साथ हमेशा शांति का रास्ता ढूंढने के लिए तत्पर रहते थे। बेशक, वह एक पाकिस्तानी थे।' स्वामी चूंकि भाजपा में हैं इसलिए पार्टी के नेता यह पढ़कर कांग्रेस को घेर नहीं सकते। देश के पूर्व मंत्री रहे स्वामी ने भी तो थरूर जैसी ही बात कही है। वह स्पष्ट रूप से यह लिखने से भी बचे कि उन्होंने तख्तापलट कर पाकिस्तान की सत्ता हथिया ली थी, इस बात को भी उन्होंने दूसरे और सहज तरीके से कहा।
अब थरूर के शब्दों पर ध्यान दीजिए
भाजपा ने थरूर को घेरना शुरू किया तो कांग्रेस नेता ने एक और ट्वीट किया। उन्होंने कहा कि मैं ऐसे भारत में पला-बढ़ा, जहां व्यक्ति की मौत के बाद उसके बारे में अच्छी बातें करने की उम्मीद की जाती है। थरूर ने कहा, 'मुशर्रफ एक दुश्मन थे और करगिल के लिए जिम्मेदार थे लेकिन उन्होंने भारत के साथ 2002-07 के दौरान शांति बनाए रखने के प्रयास किए। वह कोई मित्र नहीं थे लेकिन उन्होंने रणनीतिक लाभ के लिए शांति का रास्ता चुना।' इससे पहले उन्होंने कहा था कि कभी भारत के कट्टर शत्रु रहे मुशर्रफ 2002-2007 के बीच शांति की असली ताकत बन गए थे।’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने संयुक्त राष्ट्र में उन दिनों हर साल उनसे मुलाकात की थी... ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दें।’
थरूर हों या स्वामी आम लोग सोशल मीडिया पर भी यही सवाल उठा रहे हैं कि पाकिस्तान का चाल-चरित्र तो 1947 से देखा जा रहा है। सियासतदान कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। क्या वहां के नेताओं को आज तक समझ में नहीं आया कि भारत के साथ दोस्ती रखने में ही भलाई है और हर तरह से फायदा है। अगर ऐसा नहीं है, तब तो भारत के नेताओं को उन्हें समझाने के लिए पाकिस्तान का दौरा भी करना चाहिए। परवेज मुशर्रफ का एक दुर्लभ बीमारी के कारण रविवार को निधन हो गया।

एक्सपर्ट का साफ कहना है कि करगिल युद्ध के बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठकर मुशर्रफ को लगा कि भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं रखे गए तो पाकिस्तान में कुछ भी बदलाव नहीं आएगा। अगर मुशर्रफ के प्रयासों में कुछ भी सच्चाई होती तो कश्मीर पर बनते-बनते बात बिगड़ नहीं जाती। 2008 में मुंबई को दहलाने की साजिश नहीं होती। पाकिस्तान में तैनात रहे पूर्व भारतीय उच्चायुक्त टी.सी.ए. राघवन कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों का दौर 2004 में वाजपेयी के समय शुरू हुआ था और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 2008 में मुंबई आतंकी हमले तक जारी रहा।

पूर्व राजनयिक पार्थसारथी ने बताया कि वह मुशर्रफ को व्यक्तिगत रूप से जानते थे... मुशर्रफ को पूरा यकीन था कि वह करगिल में पूरे पहाड़ी क्षेत्रों पर कब्जा करने में सफल होंगे और हमारे संचार तंत्र को प्रभावित कर सकेंगे।’ इस तरह से देखिए तो दोहरे चरित्र वाले मुशर्रफ का उदाहरण पाकिस्तानियों के लिए नजीर बन गया। पहले भारत के खिलाफ साजिश रचो, हमला करो बाद में शांति का राग अलापने लगो, जैसा आज भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गाते रहते हैं।




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