देश के इतिहास की वो काली रात, 19 माह में 83 लाख नसबंदी, फिर इंदिरा-संजय हारे चुनाव
Updated on
12-06-2023 06:50 PM
पटना: दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन, संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था। कहते हैं कि हर नाम का जिक्र होता और फिर नजरें इंदिरा गांधी पर टिक जाती। इंदिरा गांधी अपनी राय प्रकट करती गई। सूची लंबी होती गई। 26 जून की सुबह इंदिरा गांधी की पलकें तब बंद हुई, जब जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, समेत तमाम बड़े नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे।
ये तब हुआ, जब एक बूढ़े ने हुंकार भरी
जगह थी दिल्ली की रामलीला मैदान। वहां हुंकार भर रहा था सत्तर साल का एक बूढ़ा लोकनायक जयप्रकाश नारायण। खुल कर किया जा रहा था इंदिरा सरकार की जन विरोधी नीतियों का विरोध। उधर, जनविरोधी इंदिरा गांधी के विरुद्ध जेपी ने संपूर्ण क्रांति का उद्घोष क्या किया, इंदिरा गांधी की पूरी सरकार हिल गई।
25 जून 1975 की जनसभा में जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ललकारते हुए जनविरोधी सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। जब ये संकल्प लिया जा रहा था, तब रामलीला मैदान में विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेता मौजूद थे। ये वही जगह थी जहां उत्साह से लबरेज जेपी ने 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' का नारा देश की जनता के हवाले किया।
नए नेताओं का साथ और कांग्रेस
ये वो दौर था, जहां इंदिरा गांधी से थोड़ा हटकर संजय गांधी की राजनीति आकार ले रही थी। वंशीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता संजय गांधी के करीब आ गए और नीति-निर्धारण में तव्वजो रखने लगे। सूचना प्रसार पर नियंत्रण का खेल इसी दौरान खेला गया।
संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनाया। फिर लोकतंत्र के चौथे खंबे का एक नया दौर शुरू हुआ। लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी गई। विरोध जिस किसी का भी सामने आया उसे जेल के रास्ते से गुजरना पड़ा।
आपातकाल और संजय गांधी
ये संजय गांधी को स्थापित करने का भी समय था। संजय गांधी की नीतियां एन-केन प्रकारेण जनता के सिरे तक पहुंचाई जा रही थी। इसी दौरान लाया गया संजय गांधी की सोच यानी पांच सूत्री कार्यक्रम। इसमें शामिल था वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा का खात्मा, पेड़ लगाना, परिवार नियोजन और जाति प्रथा उन्मूलन। इन पांच सूत्री कार्यक्रम की एक बानगी का कहर गिरा था दिल्ली के तुर्कमान गेट। तब सौंदर्यीकरण के नाम पर झुगियों को हटा दिया गया।
परिवार नियोजन के नाम पर जबर्दस्ती का आलम था। नसबंदी जबरन कराया जा रहा था। लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी कराई गई। एक आंकड़े के अनुसार 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई थी। बकौल आरके धवन संजय गांधी के पॉलिटिक्स में आने के बाद 5 सूत्री प्रोग्राम के तहत नसबंदी को लेकर आक्रोश बढ़ने लगा। इसके बाद इंदिरा गांधी नाराज हो गईं। उन्होंने इमरजेंसी हटाने का फैसला ले लिया।
इस संदर्भ में एक और बात की चर्चा थी कि संजय गांधी का इरादा आपातकाल हटाने का नहीं था। वे चाहते थे कि 35 साल तक इमरजेंसी लगी रहे। लेकिन इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए।
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