रॉ के पूर्व चीफ एके वर्मा बताते हैं कि कलकत्ता के पास निर्वासन में बांग्लादेश की लीडरशिप गठित की गई। मुक्ति वाहिनी उनकी फौज थी। यह भारतीय सेना, रॉ और आईबी का संयुक्त ऑपरेशन था। शंकर नायर रॉ में नंबर-2 थे। वह कर्नल मेनन के नकली नाम से मुक्ति फौज से मिलते थे। धीरे-धीरे मुक्ति फौजी वापस बांग्लादेश में घुसने लगे। ये इंटेलिजेंस भारतीय सेना तक पहुंचाने लगे थे। बताते हैं कि तब काव ने इस तरह नेटवर्क खड़ा कर दिया था कि पाकिस्तान जो कुछ करने वाला होता था, भारत को पहले ही पता चल जाता था। पाकिस्तान आर्मी के वॉर रूम में भी भारतीय खुफिया एजेंट की पहुंच थी। एक एजेंट ने खबर दी कि पाक एयरफोर्स को भारत के बेस पर अचानक हमले का आदेश दिया गया है। 72 घंटों के भीतर हमला होना था। एक वैकल्पिक तारीख भी पता चली 2 दिसंबर 1971।
3 दिसंबर को जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी ज्यादा नुकसान नहीं कर सके क्योंकि सेना पहले से तैयार थी और इसकी वजह थी रॉ को मिला खुफिया इनपुट। जिस गलती का इंतजार भारत बड़ी बेसब्री से कर रहा था, वह गलती पाकिस्तान ने कर दी थी। भारत युद्ध के लिए तैयार था। 14 दिन तक युद्ध चला। ईस्ट और वेस्ट दोनों क्षेत्रों में पाकिस्तान को करारा जवाब मिला। बांग्लादेश के जेसोर में सेना पहले ही जीत हासिल कर चुकी थी। अब ढाका पहुंचने के लिए एक बड़ा साहसिक फैसला लिया गया। पैराट्रूपर्स को एनमी लाइंस के पीछे एयर ड्रॉप किया गया जो मुक्ति वाहिनी फौजियों से मिले। ढाका को घेर लिया गया। 16 दिसंबर 1971 को शाम 4 बजे जनरल नियाजी ने सरेंडर पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया। ढाका में भारतीय सेना का हीरोज की तरह स्वागत किया गया।
ईस्ट पाकिस्तान को बांग्लादेश बनना ही था और यह 9 महीने में सोचा-समझा गया और हो गया। बांग्लादेश बनना सफल इंटेलिजेंस का बेहतरीन उदाहरण है, पर खुफिया मिशनों की कामयाबी का उतना जिक्र नहीं होता है। आरएन काव और शंकर नायर को इसका पूरा श्रेय दिया जाता है। पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले अगर तीन भारतीयों का जिक्र हो तो पीएम इंदिरा गांधी, भारतीय सेना के चीफ सैम मानेकशॉ के साथ रॉ के चीफ आरएन काव का भी नाम लिया जाता है। शुरूआत में काव ने 250 शार्प माइंड वाले आईबी अधिकारियों को रॉ के लिए चुना था। बाद में पूरी दुनिया में काव के एजेंट फैल गए। काव की एक्सपर्टीज इसी से समझिए कि जिन लोगों को ट्रेनिंग मिलती थी वे खुद को 'कावब्वॉयज' कहलाना पसंद करते थे।
