राष्ट्रपति ने कहा कि मैं आज राष्ट्रपति हूं तो यहां राष्ट्रपति भवन में हूं। लेकिन यह मेरा नहीं है। यहां से तो कुछ समय बाद जाना ही है, लेकिन यह देश तो मेरा ही है। जब तक मैं हूं, तब तक मेरा रहेगा। हमेशा रहेगा। इसलिए पहले देश-प्रेम का भाव होना चाहिए। अपने और परिवार के हित की एक सीमा हो सकती है। उसके आगे ‘कुछ मेरा नहीं, सब तेरा है’ का भाव होना चाहिए। जिस दिन हम स्वार्थ को त्याग देंगे, उस दिन हम आगे बढ़ जाएंगे।
उन्होंने कहा कि देश की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। सभी देश अपने-अपने दायरे में रहेंगे तो सामंजस्य बना रहेगा। लेकिन अगर कोई दुश्मनी करता है, आक्रमण करता है तो हमें उसका सामना करना पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग भी महत्वपूर्ण है और भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा है। जब कोई देश किसी परेशानी में पड़े हैं, हम उनकी मदद करते रहे हैं। ऐसे में, भारत सरकार हमेशा आगे आई है और उन देशों के साथ सहयोग किया है।
कई चीजें एक देश में उपलब्ध होती हैं लेकिन दूसरे देशों में नहीं, इसलिए सभी देशों के बीच ‘सहयोग के धर्म’ और ‘संपर्क की भावना’ को मजबूत बनाना महत्वपूर्ण है।
महिलाओं की भूमिका और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विषयों से होते हुए यह बातचीत अध्यात्म की दिशा में मुड़ी। समीर जैन ने याद दिलाया कि राष्ट्रपति ने शिव और शक्ति का बहुत अच्छा उदाहरण देकर महिलाओं और पुरुषों के सामंजस्य को समझाया। राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि जिस तरह एक विषय अलग-अलग लोगों को दिया जाए तो वे उसे अलग-अलग तरह से समझेंगे, लेकिन सभी का लक्ष्य एक ही होगा, इसी तरह धर्म और अध्यात्म में शैलियां भिन्न-भिन्न होती हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही होता है।
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि कुछ ज्वलंत मुद्दों पर समाज में चर्चा की जरूरत है ताकि बदलाव आए। इनमें सबसे बड़ा विषय दहेज की कुप्रथा है, जो एक विकराल रूप ले चुकी है। इसके कारण, अनेक परिवार बर्बाद हो जाते हैं। अच्छा भला कमाने वाले भी दहेज देने के लिए मजबूर करते हैं। पढ़े-लिखे परिवारों में भी यह सब चल रहा है। इसका एक नतीजा, बाल विवाह के रूप में सामने आता है क्योंकि लोगों को लगता है कि बेटी पढ़-लिख जाएगी तो बाद में ज्यादा दहेज की मांग होने लगेगी। दहेज के डर से ही लोग भ्रूण-हत्या तक करने लगते हैं। दहेज के खिलाफ समाज में अभियान चलना चाहिए और महिलाओं को भी दहेज-विरोध के लिए आगे आना चाहिए।
