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रोहिल्लाओं और सिंधियाओं के उस जंग की कहानी, जिसका ज्‍योतिरादित्‍य ने किया जिक्र

Updated on 27-05-2023 06:47 PM
नई दिल्‍ली: केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) शुक्रवार को उत्‍तर प्रदेश के मैनपुरी में थे। मैनपुरी में सिंधिया तिराहे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और ज्‍योतिरादित्‍य के पिता माधवराव सिंधिया की प्रतिमा के अनावरण समारोह में वह पहुंचे थे। इस दौरान ज्‍योतिरादित्‍य ने मैनपुरी से सिंधिया परिवार के रिश्‍ते का जिक्र किया। उन्‍होंने बताया कि यह 250 साल पुराना है। इतिहास के कालखंड में एक समय रहा है जब मैनपुरी में विदेशी ताकतें अपने पैर पसार रही थीं। उस जमाने में रोहिल्ला अफगान अत्याचार करने की मुहिम पर निकले थे। तब उनके पूर्वजों दत्ताजी राव सिंधिया (Dattaji Rao Scindia) और उसके बाद महादजी (Mahadaji Scindia) ने रोहिल्ला अफगानों को उखाड़ फेंकने का काम किया था। यह 1770 के आसपास की बात है। एटा, इटावा, बदायूं और नजीबाबाद तक रोहिल्ला अफगानों को उखाड़ फेंकने का काम सिंधिया परिवार ने किया था। कौन थे दत्ताजी राव सिंधिया और महादजी सिंधिया, इन्होंने उस जमाने में अफगान रोहिल्‍लाओं से कौन सी लड़ाई लड़ी। आइए, यहां जानते हैं।
कौन थे दत्ताजी राव सिंधिया?
दत्ताजी राव शिंदे को दत्ताजी राव सिंधिया के नाम से भी जाना जाता है। वह सिंधिया वंश के संस्थापक राणोजी राव शिंदे और मैनाबाई के दूसरे बेटे थे। उनके बड़े भाई का नाम जयप्पाजी राव शिंदे था। छोटे भाई का नाम ज्योतिबा राव सिंधिया था। दत्ताजी राव मराठा साम्राज्य में सरदार थे। दत्ताजी राव महादजी शिंदे के बड़े सौतेले भाई थे। बाद में वह ग्वालियर के प्रमुख बने। पिता की मौत के बाद उनके बड़े भाई जयप्पाजी राव को ग्वालियर का महाराजा बनाया गया था। जयप्पाजी के निधन के बाद उनके बेटे जानकोजी राव ने ग्वालियर रियासत की गद्दी संभाली। लेकिन, तब जानकोजी सिर्फ 10 साल के थे। इस कारण दत्ताजी राव सिंधिया ही रियासत का सारा कामकाम देखते थे।
अफगानों और मराठों के बीच छ‍िड़ा हुआ था संघर्ष
1758-59 के आसपास देश के उत्तरी हिस्‍सों में अफगानों और मराठों के बीच में संघर्ष छिड़ा हुआ था। मैनपुरी, इटावा, मेरठ, बदायूं, नजीराबाद तक रोहिल्ला अफगानों का आतंक था। अफगानों का सामना करने के लिए इस दौरान दत्ताजी राव शिंदे को पंजाब प्रांत की कमान सौंपी गई थी। अहमद शाह दुर्रानी की अगुआई में अफगानी सेना पंजाब पर आक्रमण करने के लिए तैयार थी। उसे रोकने के लिए मराठा साम्राज्य के पेशवा ने दत्ताजी राव को सिपहसालार बनाया था। युद्ध के मैदान में दत्ताजी ने अहमद शाह दुर्रानी को धूल चटा दी थी। वह दुर्रानी को खदेड़ने में कामयाब हुए थे। यही नहीं, उनके नेतृत्‍व में मराठों ने अटॉक और पेशावर के किलो पर विजय पताका भी फहराया था। बाद में अहमद शाह दुर्रानी और नजीब खान रोहिल्ला साथ आ गए थे। इसके चलते उनकी सेना बहुत बड़ी हो गई थी। दिल्ली के नजदीक बुरारी घाट युद्ध में दत्‍ताजी इस विशाल सेना से हार गए। 1761 को उन्‍हें बेरहमी से मार दिया गया था। दत्‍ताजी की शहादत के एक साल बाद पानीपत की लड़ाई हुई थी।

फ‍िर महादजी राव ने अफगानोंं को खदेड़ा
दत्‍ता राव के बाद अफगानों को चुनौती देने की मशाल महादजी के पास गई। उन्‍होंने 1794 तक ग्‍वालियर पर शासन किया। वह राणोजी राव के पांचवें बेटे थे। उत्‍तर भारत में मराठाओं की ताकत को बढ़ाने में उनका भरपूर योगदान था। वह पेशवा के सबसे भरोसेमंद थे। उनके जमाने में ग्‍वालियर मराठा साम्राज्‍य का मुख्‍य गढ़ बन गया था। 1772-73 में उन्‍होंने रोहिलखंड में पश्‍तून रोहिल्‍लाओं को नेस्‍तनाबूद कर नजीबाबाद को अपने कब्‍जे में ले लिया था।

ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने रोहिल्‍लाओं का जिक्र करते हुए इसीलिए इन दोनों का नाम लिया। उन्‍होंने कहा कि इतिहास के कालखंड में जब भारत माता की धरती पर विदेशी ताकतें अपना पैर पसार रही थीं और रोहिल्ला अफगान इस क्षेत्र पर अत्याचार करने की मुहिम से निकले थे तो उनके पूर्वज दत्ता जी महाराज सिंधिया और उनके बाद महादजी महाराज ने इस पूरे क्षेत्र में भारत माता की एकता अखंडता बनाए रखने के लिए रोहिल्ला अफगानों को उखाड़ फेंकने का काम किया।

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