आनंद मोहन जैसे दोषियों के रिहा होने के क्या हैं कानून? संगीन अपराध में सजा पाए लोगों की रिहाई पर लीगल एक्सपर्ट्स की राय
Updated on
01-05-2023 06:49 PM
संगीन अपराध की सजा पाया कोई शख्स क्या असमय जेल से निकल सकता है? उम्रकैद काट रहे अपराधियों को कब और किन हालात में जेल से छोड़ा जाए क्या इसके लिए तय गाइडलाइंस हैं? ये सवाल तब उठे जब पिछले दिनों गोपालगंज के तत्कालीन डीएम की हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन को सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया। हाल ही में बिलकिस बानो रेप और परिवार के लोगों की हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काटने वाले 11 दोषियों को गुजरात सरकार ने 14 साल सजा काटने के बाद रिहा कर दिया था। दोनों मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है।
ऐसे मामलों पर एक नजर
तंदूर कांड में उम्रकैद की सजा पाए सुशील शर्मा को 23 साल जेल में रहने के बाद हाल ही में रिहा किया गया था। सुशील शर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
जेसिका लाल हत्याकांड में दोषी करार दिए गए मनु शर्मा को 14 साल साल से ज्यादा वक्त जेल में बिताने के बाद रिहा किया गया। जेल में रहने के दौरान उसका कंडक्ट अच्छा था इसी आधार पर रिहाई का फैसला हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल राजीव गांधी के हत्यारे ए. जी. पेरारिवालन को रिहाई का आदेश दिया था। पेरारिवालन उम्रकैद की सजा काट रहा था और 32 साल जेल में बिता चुका था। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सजा में छूट दी।
क्या है कानूनी प्रावधान
कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, उम्रकैद का मतलब उम्र भर जेल से है। मगर, सरकार के पास मुजरिम के आचरण के आधार पर सजा माफ करने का अधिकार है। मगर, मुजरिम को हर हाल में कम-से-कम 14 साल जेल में सजा काटनी होगी। एडवोकेट नवीन शर्मा बताते हैं कि IPC की धारा-45 के मुताबिक उम्रकैद का मतलब उम्र भर जेल काटने से है। हालांकि, 1955 से पहले हत्या जैसे मामलों में जब आरोपी को दोषी करार दिया जाता था तो उसे फांसी की सजा दी जाती थी या फिर उसे कालापानी की सजा होती थी। मगर, बाद में कालापानी की सजा को खत्म करते हुए उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया।
क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
एडवोकेट रमेश गुप्ता बताते हैं कि पहली बार 1961 में सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि आखिर उम्रकैद का मतलब क्या है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने कहा था कि सजा में छूट का लाभ तभी होगा जब सरकार उम्रकैद की सजा को किसी अवधि में बदल दे। इसके बाद मुजरिम को CrPC की धारा-432 का लाभ मिल सकता है। इस धारा के तहत सरकार तब चाहे सजा में छूट दे सकती है। इसमें प्रावधान है कि सरकार सजा में छूट दे सकती है और 433 के तहत सजा में बदलाव कर सकती है। इस प्रावधान के तहत सरकार की ओर से कुछ मनमानी हुई और 1978 में CrPC की धारा में बदलाव करते हुए धारा-433 ए जोड़ा गया। इसके तहत कहा गया कि सरकार उम्रकैद की सजा को 14 साल से कम नहीं कर सकती। यानी 14 साल सजा काटने के बाद ही सजा में छूट दी जा सकती है। 1978 में मेरू राम से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने कहा कि CrPC में बदलाव कानून संगत है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उम्रकैद का मतलब उम्रकैद ही होता है लेकिन सरकार अगर चाहे तो 14 साल या उससे ज्यादा सजा काट चुके मुजरिम की बाकी की सजा में छूट देकर उसे रिहा कर सकती है।
मनाही पर रिहाई नहीं
भारत सरकार के वकील अजय दिग्पाल ने बताया कि कई बार अदालत जब उम्रकैद का फैसला सुनाती है तो फैसले में लिखती है कि 20 साल 25 साल या फिर ताउम्र सजा में छूट नहीं मिलेगी। वैसे मामले में सरकार CrPC के प्रावधान का इस्तेमाल कर सजा में छूट नहीं दे सकती। जेल मैन्यूअल के मुताबिक, उम्रकैद की सजा पाया मुजरिम जब 14 साल कैद काट लेता है तो जेल प्रशासन उसके कंडक्ट के आधार पर उसके केस को सजा रिव्यू बोर्ड के पास भेजती है। बोर्ड मुख्य अभियोजन एजेंसी की रिपोर्ट मांगता है और आचरण आदि पर गौर करने के बाद फैसला लेता है। मुजरिम भी अपना आवेदन कई बार सजा रिव्यू कमिटी के सामने भेजता है।
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