UGC केस पर रोक से RJD को क्या हुआ बड़ा नुकसान? झुंझलाने की वजह है यह 'सीक्रेट' एजेंडा
Updated on
30-01-2026 01:00 PM
पटना: यूजीसी के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट के रोक लगाते ही जाने अंजाने में बिहार की सियासत में पिछड़ावाद की राजनीति को जबरदस्त ब्रेक लग गया। बिहार की सियासत में एनडीए की राजनीति के बढ़ते कदम से परेशान राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने यूजीसी के नए नियम के सहारे बिहार की सियासत को कई दशक पहले वाले 'मंडल युग' में लाने की जो कोशिश की थी, उस पर फिलहाल विराम मिल गया है। आखिर राजनीति का ऐसा क्या फलाफल पाने से चूक गया राजद, जिसके चलते उनके गलियारों में नाराजगी का दौर चल पड़ा। चलिए समझते हैं?
सामाजिक न्याय बनाम पिछड़वाद
कांग्रेस को सत्ता से बेदखल का खेल बिहार की सियासत में पिछड़ावाद की राजनीति के सहारे ही संभव हुआ। इस पिछड़वाद की राजनीति कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण से शुरू हुई, वह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के समय सामाजिक न्याय के नाम पर चरम पर पहुंची। सत्ता परिवर्तन के इस खेल में पिछड़वाद की राजनीति जब तक परवान पाई, तब राजद की राजनीति बुलंदी पर सवार थी।
पिछड़ेवाद की राजनीति के दो 'चितेरे' लालू यादव और नीतीश कुमार की राजनीति जब अलग हुई तो संपूर्ण पिछड़ावाद दो धड़ों में बंट गया। पिछड़ावाद की राजनीति में दो कोण बने। एक यादव की डॉमिनेंस वाला धड़ा और दूसरा कुर्मी, कुशवाहा के नेतृत्व में बना दूसरा धड़ा। इस दूसरे धड़े का नेतृत्व नीतीश कुमार के हाथ में था। पिछड़ों की राजनीति विभाजित हुई और नीतीश कुमार के धड़ा को बीजेपी का साथ मिला। बिहार की सियासत में एनडीए की सत्ता का उदय हुआ। और फिर सत्ता की आंख मिचौली शुरू होती गई।
यूजीसी के नए निर्देश से गरमाई राजनीति
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए।यूजीसी के नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित किया गया है और इसे खत्म करने के लिए इक्विटी कमेटियां गठित करने का प्रावधान रखा गया। इन कमेटियों में केवल आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के प्रतिनिधित्व की बात कही गई।इस नियम के आने के बाद समाज फिर अगड़ा और पिछड़ा में बंट गया। अब जिस पार्टी का आधार वोट सवर्ण है, उसने मौके की नजाकत को समझते चुप्पी साध ली। इस चुप्पी में भाजपा के साथ एनडीए के साथी दल तो थे ही, राष्ट्रीय कांग्रेस के रणनीतिकार भी इस चुप्पी के साथ हो लिए। ऐसे में पिछड़े की राजनीति का पहिया घुमाते राष्ट्रीय जनता दल के तमाम नेता सड़कों पर आ गए।
मोदी समर्थन में क्यों राजद?
बिहार के चुनावी जंग में फिलहाल मिली जबरदस्त हार के बाद राजद की राजनीति का यह एक तरह से विराम काल सा था। यूजीसी के इस बदले नियम ने राजद की राजनीति में जो शून्यता भर गई थी, उसने जान डाल दी। पीएम नरेंद्र मोदी नीत सरकार ने यूजीसी के बदले नियम से जिस पिछड़ावाद की राजनीत को आवाज दी। राजद ने उस राजनीति को धार देना शुरू कर दिया। स्थितियां ऐसी हुई कि समस्त राजद मोदी समर्थक बन सड़कों पर उतर आए। एक तरफ जहां तमाम दलों ने चुप्पी साध ली। राजद के रणनीतिकार, प्रवक्ता खुल कर मैदान में आकर पिछड़ों के सबसे बड़ा पैरोकार के रूप में खुद को स्थापित करने लगे।
राजद के निशाने पर 100 में 60
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राजद के भीतर नाराजगी ही नहीं है, बल्कि उनकी ओर से शुरू किए गए आंदोलन पर असमय हुए तुषारापात के रूप में देख रहे हैं। राजद इस आंदोलन को मंडल के दौर में ले जाकर उस वोट को पाने की कवायद करना चाहते थे, जो उन से टूट कर नीतीश कुमार ने हासिल कर पिछड़ावाद की ताकत को कम कर दिया था। राजद भाजपा और जदयू की चुप्पी के बीच पिछड़ेवाद की राजनीति को एक नए रूप में परिभाषित करना चाहती भी थी। पर, सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक ने राजद के मंसूबे पर पानी फेर दिया।
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