वैसे, देश में सिविल और धार्मिक दोनों तरह के विवाह की स्वीकृति है। सिविल कानून में कुछ शर्तें भी हैं। जैसे, शादी के समय वर या वधू का पहले से जीवनसाथी नहीं होना चाहिए। जोड़े में कोई ऐसा न हो जो शादी के लिए सहमति देने की स्थिति में न हो। मानसिक बीमारी नहीं होनी चाहिए।
वर-वधू पक्ष से नोटिस मिलने के बाद अगले 30 दिन में शादी को लेकर कोई तीसरा शख्स आपत्ति दर्ज करा सकता है। इस दौरान एक पब्लिक नोटिस जारी होता है। एक कॉपी नोटिस बोर्ड पर लगती है और एक-एक कॉपी दोनों पक्षों को रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजी जाती है। SDM 30 दिन में आई आपत्तियों को देखते हैं और उसके बाद पंजीकरण होता है। सब कुछ ठीक रहा तो प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। दोनों पक्ष ऑफिस में उपस्थित रहते हैं और तीन गवाह हस्ताक्षर करते हैं। इस तरह से मैरिज ऑफिसर विवाह को कानूनी मान्यता दे देते हैं।
अब ऐक्ट में बदलाव की मांग
स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत लड़का और लड़की दोनों बालिग होने चाहिए। वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं। लड़की की उम्र कम से कम 18 साल और लड़के की उम्र कम से कम 21 साल होनी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर स्पेशल मैरिज ऐक्ट को जेंडर न्यूट्रल करने की गुहार लगाई गई है।
