1 जनवरी 1953 को गुजरात (गिर) के जंबूर गांव में जन्मी हीराबाई छोटी थीं तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया। दादी ने उन्हें पाला। उन्हें शुरुआती शिक्षा नहीं मिली और न कभी स्कूल या कॉलेज गईं। कम उम्र में ही उनकी शादी श्री इब्राहिम भाई लोबी से हो गई। वह अपने पति के साथ जमीन के एक छोटे से टुकड़े में खेती करके गुजर बसर करने लगीं। तब आधुनिक संसाधन या उपकरण नहीं थे, तो उन्हें हाथ से मिट्टी खोदनी पड़ती थी।
वह सिद्दी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं, जो जंबूर की कुल आबादी का 98 प्रतिशत हैं। सिद्दी वास्तव में अफ्रीकी जनजाति है जिन्हें करीब 400 साल पहले जूनागढ़ के शासक के राज में गुलाम बनाकर भारत लाया गया था। गुजरात के सबसे ज्यादा पिछड़े समुदायों में से एक सिद्दी जनजाति के लोगों ने दशकों तक बेहद मामूली जीवन जिया। किसी ने उनके उत्थान के बारे में नहीं सोचा। ऐसे में हीराबाई ने अपने समाज की महिलाओं की जिंदगी बदलने का बीड़ा उठाया। वह बिना चर्चा में आए सौराष्ट्र के 18 गांवों में काम कर रही हैं। इसे 'क्रांति' कहा जाता है। उन्होंने रोजगार, स्वास्थ्य, खानपान को बेहतर करने और जागरूकता फैलाने के लिए काफी काम किया। उन्होंने स्कूल बनवाने में मदद की और इससे 700 से ज्यादा महिलाओं और बच्चों की जिंदगी बदल गई। उन्हें देश-विदेश से कई सम्मान मिल चुके हैं। आज पूरा भारत उन्हें सलाम कर रहा है।