गटर में रातें गुजार फिल्मों में आए थे अजीत, इनसिक्योर हो गए थे बॉलीवुड के हीरो, 'नया दौर' के बाद नहीं मिला काम
Updated on
02-03-2024 01:09 PM
'मोना डार्लिंग' कहने वाले बॉलीवुड के विलन अजीत अब हमारे बीच नहीं हैं। उनको 1960 और 1970 के दशक के सबसे मशहूर खलनायकों में से एक के रूप में याद किया जाता है। लेकिन जब उन्होंने अपना करियर शुरू किया, तो वह कई सहायक भूमिकाओं में दिखाई दिए थे। उनकी सबसे चर्चित भूमिका दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की फिल्म 'नया दौर' में थी, जहां उन्होंने सपोर्टिंग रोल निभाया और उसी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। अब उनके बेटे शहजाद खान ने उनके बारे में एक इंटरव्यू में कुछ खुलासे किए हैं। दिग्गज एक्टर के संघर्ष के दिनों को याद किया है। बताया कि उनके पिता को अपने पूरे करियर के दौरान कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।
सिद्धार्थ कन्नन के साथ बातचीत में शहजाद ने कहा कि फिल्म 'नया दौर' के बाद उनके पिता अजीत खान ने अपने करियर में गिरावट देखी क्योंकि उन्हें 4-5 साल तक कोई काम नहीं मिला। 'नया दौर के बाद उनका बुरा समय शुरू हुआ। उनके पास 4-5 साल तक कोई काम नहीं था।' जब उनसे इसके पीछे का कारण पूछा गया तो शहजाद ने बताया की लीड एक्टर्स 'इनसिक्यो' थे और उन्हें लगा कि अजीत उनकी लाइमलाइट चुरा लेंगे।
गटर में सोते थे अजीत खान
उन्होंने कहा, 'हीरोज इस बात को लेकर इनसिक्योर थे कि अगर वह अजीत के साथ काम करेंगे तो पापा अवॉर्ड ले लेंगे और उन हीरोज को पहचान नहीं मिलेगी।' उन्होंने पिता के मुंबई में संघर्ष के दिनों को याद किया। बताया कि अजीत को कई दिनों तक गटर में सोना पड़ा था। 'उन्होंने मुझे मोहम्मद अली रोड के पास एक गटर दिखाया था और कहा था कि जब वह हैदराबाद से मुंबई आएं थे तो उन्हें गटर में सोना पड़ा था।'
अजीत ने बेच दी थीं पैसों के लिए किताबें
शहजाद ने कहा कि उनके पिता ने वास्तव में अपनी कॉलेज की किताबें बेच दीं थीं, जिससे वह मुंबई आने के लिए कुछ पैसे इकट्ठा कर सकें। 1998 में अजीत का निधन हो गया था और उसके कुछ साल बाद मां सारा को भी कैंसर हो गया। शहजाद ने बताया कि उनके भाइयों ने खर्चा उठाने से भी साफ इनकार कर दिया था, जबकि वो आर्थिक रूप से अच्छा कर रहे थे।
शहजाद के भाइयों ने नहीं कराया था मां का इलाज
उन्होंने बताया कि उनके पिता अपने पीछे जो पैसे छोड़ गए थे, वह सब उनके रिश्तेदारों और उनके भाई ने ले लिए थे। जिसके कारण उनके लिए अपनी मां का इलाज कराना मुश्किल हो गया था। 'जब मेरी माँ का निधन हुआ तो मेरे भाई ने 5000 रुपये के अस्पताल के बिल का भरने से मना कर दिया था। उनके पास अच्छी-खासी प्रॉपर्टी थी। बावजूद इसके उन्होंने मां की जूलरी भी ले ली और अस्पताल की फीस भी नहीं जमा की।
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