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बेटे को बीमारी से बचाते-बचाते खड़ी कर दी कंपनी, अगर मार्केट में मिलता यह प्रोडक्ट तो आज नहीं होती मामाअर्थ

Updated on 04-11-2023 03:57 PM
बलराज साहनी। 50 के दशक के सबसे नैचुरल एक्टर्स में से एक। और उनके बेटे परीक्षित, जिन्होंने 90 का दशक शुरू होने से पहले अपने करियर की शुरुआत की। अपने पिता के नक्शे कदम पर चले। उन्हीं की तरह खूब सफलता भी पाई। लेकिन इस कामयाबी को पाने के लिए कड़ी मेहनत भी करनी पड़ी। भले ही वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के फेमस एक्टर के बेटे थे, स्टार किड थे, लेकिन तब जमाना कुछ और था। भले ही वो 'मुंह में सोने का चमचा लेकर पैदा' हुए थे, लेकिन सक्सेस उन्हें अपने बलबूते ही मिली। हमारे 'सेटरडे सुपरस्टार सेगमेंट' में आइये जानते हैं उनके बारे में अनसुनी-अनकही बातें।

Parikshit Sahni 1 जनवरी 1944 को जन्में थे। उनके पिता बलराज साहनी तब यूनिवर्सिटी में इंग्लिश के टीचर थे। उनकी मां दमयंती साहनी ग्रेजुएशन कर रही थीं। उन्होंने दिल्ली में पढ़ाई-लिखाई की और बतौर चाइल्ट आर्टिस्ट अपने करियर की शुरुआत की। परीक्षित ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता फ्रीडम फाइटर भी थे, इसलिए उन्हें घर से दूर बोर्डिंग में भेज दिया गया, लेकिन जब वो छुट्टियों पर आते थे तो उन्हें महसूस होता था कि परिवार भुखमरी से जूझ रहा है। घर के बहुत मुश्किल हालात होते थे।

पैरेंट्स का फिल्मों से रहा नाता

परीक्षित सिन्हा के पैरेंट्स थिएटर और फिल्म एक्टर्स थे। उनकी मां की मौत 1947 में बहुत ही कम उम्र में हो गई थी। मौत से पहले उन्होंने कुछ फिल्मों में काम किया था। पहली बीवी की मौत के 2 साल बाद बलराज साहनी ने संतोष चंदोख से शादी कर ली थी।

विदेश जाकर की पढ़ाई

परीक्षित के अंकल भीष्म साहनी थे, जोकि साहित्य की दुनिया का बड़ा नाम थे। उन्होंने बलराज साहनी को एक सलाह दी। परीक्षित को आर्किटेक्चर के पांच साल के कोर्स के लिए मॉस्को भेज दिया गया। हालांकि, वो गणित में कमजोर थे, इसलिए उन्हें सिनेमा इंस्टीट्यूड में एडमिश दिलाने के लिए कहा गया। उन्होंने फिल्म डायरेक्शन का कोर्स किया और 1966 में इंडिया वापस लौटे।

राज कपूर के बने असिस्टेंट

बॉलीवुड में सबसे पहले राज कपूर के असिस्टेंट बने। राज कपूर को 'मेरा नाम जोकर' के लिए ऐसे शख्स की जरूरत थी, जो रशियन सर्कस में काम करने में उनकी मदद कर सके। इसके बाद ही परीक्षित को एक्टिंग का काम मिल गया और वो 'अनोखी रात' में नजर आए।

बदल लिया था नाम, बन गए थे अजय साहनी

परीक्षित ने अपना नाम भी बदल लिया था। 1968 में 'अनोखी रात' की शूटिंग के दौरान ही उनके दोस्त संजीव कुमार ने उन्हें नाम बदलने की सलाह दी थी, जिसके बाद उन्होंने अपना नाम अजय रख लिया था, लेकिन कुछ साल बाद अपने पुराने नाम पर वापस लौट आए थे।

टीवी सीरियल्स से मिली पहचान

परीक्षित ने दूरदर्शन के सीरियल 'गुल गुलशन गुलफाम' में बैरिस्टर विनोद का किरदार निभाया था और आज भी इस किरदार के लिए उन्हें याद किया जाता है। वो 'लगे रहो मुन्नाभाई', '3 इडियट्स' और 'पीके' जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं।

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