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पहले 'जरासंध' और अब 'भीम' की शरण में नीतीश, क्या 'चौधरी के फॉर्म्युले' से बनेगा काम

Updated on 25-11-2023 02:38 PM
पटना : जातीय वोटों को अपने पाले में करने की होड़ हर पार्टी में दिख रही। इन दिनों बिहार की राजनीति में ये काफी सक्रियता के साथ रास्ता ढूंढ रही है। कोई भी दल इस अभियान में बढ़-चढ़ कर ही हिस्सा ले रहा। जेडीयू भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं है। जदयू के भवन निर्माण मंत्री अशोक चौधरी ने इस कड़ी में दलित और महादलित को महागठबंधन के पक्ष में करने के लिए भीम संसद का आयोजन कर डाला है। हालांकि यह आयोजन पहले ही होने वाला था पर विधानसभा सत्र को ध्यान में रख कर इसकी तारीख बढ़ाकर 26 दिसंबर रखी गई।

भीम संसद क्यों?

दरअसल, जदयू की रणनीति में इस बार विशेष तौर पर दलित और महादलित को अपने पक्ष में करने की कवायद शुरू की है। इसकी जिम्मेदारी नीतीश कुमार ने भवन निर्माण मंत्री अशोक चौधरी को सौंपी है। इसकी कई वजहें हैं। आइए जानते हैं कि जेडीयू नेतृत्व क्यों व्यग्र है दलित को अपने पाले में करने को।
नीतीश कुमार ने दलित वोट को ज्यादा से ज्यादा अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें दलित और महादलित में बांटा। महादलित को विशेष सुविधा भी दी। दलित में पासवान को रखा गया था, शेष महादलित में। बावजूद इसके दलित मतों पर जेडीयू की वो पकड़ नहीं बनी जो नीतीश जी चाहते थे। बाद में पासवान को भी महादलित में शामिल करना पड़ा। इस कारण से पासवान जाति के लोग नीतीश कुमार के प्रति नाराज हुए। नीतीश कुमार को इसका काफी प्रतिरोध भी झेलना पड़ा। अब वो एक कोशिश अशोक चौधरी के बहाने करके दलितों के सामने अपना पक्ष रखना चाहते है।

राज्य में दलितों के कद्दावर नेता मसलन एलजेपी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान और हम के संस्थापक जीतनराम मांझी के निशाने पर नीतीश कुमार हैं। ऐसे में कैसे इन वोट बैंक में सेंधमारी की जा सकती है। हरिजन वोट अभी भी मायावती के आह्वान पर बीएसपी को पड़ते रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार एक सकारात्मक पक्ष रख कर दलितों को प्रभावित कर आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

साल 2020 के विधानसभा की स्थिति से निजात की तैयारी भी कह सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि 2020 के चुनाव में चिराग पासवान ने एनडीए के साथ रह कर लड़ रहे जदयू के विरुद्ध उम्मीदवार दिया और नीतीश कुमार के राजनीतिक कद को बौना कर दिया था। कुछ दिन पहले नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी पर विधानसभा में जो टिप्पणी की थी उससे दलितों के बीच काफी फजीहत हुई थी। दूसरी तरफ रामविलास पासवान की निजी जिंदगी पर टिप्पणी कर चिराग पासवान को जो हतोत्साहित करने की कोशिश की थी उसको लेकर भी पासवान में जो आक्रोश था उस दूरी को भी पटना है।

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद की पकड़ अभी भी दलितों के बीच बनी हुई है। नीतीश कुमार इस संसद के बहाने दलितों की सहानभूति और समर्थन भी पाना चाहते हैं।

तैयारियां भी पूरी हुई

भीम संसद की तैयारी भी जोर शोर से की गई। सीएम नीतीश कुमार ने 10 अक्टूबर की सुबह एक अणे मार्ग से भीम संसद रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस दौरान भीम संसद रथ के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के आदर्श, विचार और उनकी ओर से किए गए कार्यों से लोगों को अवगत कराया गया। इसके साथ ही नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में दलितों के लिए खास योजनाएं बनाई, समानता की बात की। जिस तरह से उन्होंने पंचायती राज व्यवस्था से लेकर हर जगह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सफल बनाने की कोशिश की, उन प्रयासों को जरुरतमंदों तक पहुंचाने के प्रयास किए। इस कवायद के जरिए सभी दलित भाइयों को भीम संसद में आने का आग्रह भी किया गया।

क्या है नीतीश कुमार की सोच

इस भीम संसद के जरिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते हैं कि जब तक दलितों की बड़ी आबादी को राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक उनका संपूर्ण विकास नहीं हो पाएगा। दलितों के सर्वांगीण विकास के बिना 21वीं सदी के बिहार का निर्माण संभव नहीं हो पाएगा। भीम संसद समाज के अंतिम तबके के लोगों के उत्थान के लिए हमेशा सक्रिय और सतत चिंतनशील भी रहेगा। यह महज 22 फीसदी वाले एससी और एसटी की चिंता के साथ विकसित बिहार की भी चिंता है।

हालांकि नीतीश कुमार की दलित मतों को साधने में कितनी सफलता मिलेगी वह तो आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान पता चलेगा। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में भीम संसद को लेकर यही कहा जा रहा है कि यह अन्य दलों की ओर से किए गए जातीय सम्मेलन के विरुद्ध जेडीयू की दलितों के बीच पैठ बनाने की मुहिम है।

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