भारत ने कम बजट में चंद्रयान 3 की कराई सफल लैंडिंग, हमें सीखने की जरूरत... पाकिस्तानी विशेषज्ञों ने माना लोहा
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15-09-2023 01:18 PM
इस्लामाबाद: सन् 1969 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग और एडविन एल्ड्रिन चंद्रमा पर पैर रखने वाले पहले इंसान बने थे। इस नई उपलब्धि के साथ ही अमेरिका ने भी नया मुकाम हासिल किया। इसके बाद 23 अगस्त 2023 को भारत का विक्रम लैंडर चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला रोबोट बना। इस उपलब्धि ने भारत को दुनिया का नंबर वन देश बन गया जिसने सफलता पूर्वक चंद्रमा के सबसे मुश्किल हिस्से पर लैंडिंग की। इसे देखन के लिए लाखों लोग अपने टीवी सेट से चिपके रहे और लैंडिंग के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जश्न मनाया गया। पाकिस्तान के विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहली बार नहीं था कि कोई देश चंद्रमा पर उतरा था, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह एक शानदार उपलब्धि थी।
इस्लामाबाद: सन् 1969 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग और एडविन एल्ड्रिन चंद्रमा पर पैर रखने वाले पहले इंसान बने थे। इस नई उपलब्धि के साथ ही अमेरिका ने भी नया मुकाम हासिल किया। इसके बाद 23 अगस्त 2023 को भारत का विक्रम लैंडर चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला रोबोट बना। इस उपलब्धि ने भारत को दुनिया का नंबर वन देश बन गया जिसने सफलता पूर्वक चंद्रमा के सबसे मुश्किल हिस्से पर लैंडिंग की। इसे देखन के लिए लाखों लोग अपने टीवी सेट से चिपके रहे और लैंडिंग के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जश्न मनाया गया। पाकिस्तान के विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहली बार नहीं था कि कोई देश चंद्रमा पर उतरा था, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह एक शानदार उपलब्धि थी।
अमेरिका से कम इसरो का बजट सबसे अहम सबक यह है कि कृषि, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या बाकी क्षेत्रों में निवेश की योजना बनाने से पहले एक राष्ट्र का निर्माण करना होगा जिसमें अखंडता हमारे चरित्र की मूलभूत आधारशिला हो। पाकिस्तान की खगोलशास्त्री, वैज्ञानिक और फीजिक्स के स्टूडेंट शाहीर नियाजी ने जियो न्यूज से जब बात की तो उन्होंने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। उनका कहना था कि दक्षिण एशियाई देशों में काम करना अमेरिका या यूरोपियन यूनियन की तुलना में बहुत सस्ता है। वहां बड़ी टीमें हैं और बहुत सारे खर्चे हैं जिन्हें इसरो ने टाल दिया था। मंगल ग्रह पर उनका मिशन भी पश्चिमी मिशनों की तुलना में काफी सस्ता था। भारत के पास अपनी टेक्नोलॉजी कराची यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एंड प्लैनेटरी एस्ट्रोफिजिक्स (आईएसपीए) के प्रोफेसर डॉक्टर जावेद इकबाल ने भी जियो टीवी के साथ इंटरव्यू में इसरो के अंतरिक्ष कार्यक्रमों और पश्चिम के अंतरिक्ष कार्यक्रमों के बीच अंतर की तुलना की। उन्होंने कहा कि पश्चिमी अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए काम करने वाले वैज्ञानिकों को काफी ज्यादा सैलरी मिलती है। जबकि इसरो वैज्ञानिकों की तुलनात्मक रूप से कम सैलरी ने लागत में कटौती करने में भी मदद की। इसके अलावा, भारत के पास अपनी स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक है। उन्हें पहले से ही अंतरिक्ष कार्यक्रम वाले अन्य देशों से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं थी।
देश के वैज्ञानिक दुखी युवा वैज्ञानिक शाहीर इस बात से दुखी हैं कि जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था ठीक थी तो उस समय भी देश में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए कोई सम्मान नहीं था। उनकी मानें तो पाकिस्तान के पास अभी तक कोई अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं होने के पीछे आर्थिक बाधाएं एक बड़ी समस्या है। इससे इस अभूतपूर्व क्षेत्र की सामूहिक उपेक्षा हुई, जो देश की अर्थव्यवस्था को कुशलतापूर्वक स्थिर कर सकता था। उन्होंने इस तरफ भी ध्यान दिलाया कि सभी मौजूदा सैटेलाइट टेक्नोलॉजी पाकिस्तान ने अपने सहयोगी देशों से उधार ली है। पाकिस्तान के पास अभी तक अपनी अंतरिक्ष उपग्रह तकनीक नहीं है।
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