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मैले-कुचले कमरे में चूहों के बीच सोते थे Keshto Mukherjee, स्ट्रगल के दिनों में 'दारू को बना लिया था दोस्त'

Updated on 07-08-2023 03:06 PM
केष्टो मुखर्जी का नाम जुबां पर आते ही वह चेहरा आंखों के सामने आ जाता है, जो फिल्मी पर्दे पर हमेशा ही शराबी बनकर लहराता नजर आया। जबकि वह शराबी की एक्टिंग के लिए एक बूंद दारू तक नहीं पीते थे। फिल्मों में केष्टो मुखर्जी के बेहद छोटे किरदार रहे, लेकिन अपनी एक्टिंग से उन्होंने हर किसी का दिल जीत लिया। शराबी की एक्टिंग करने में केष्टो मुखर्जी के आगे कोई टिक नहीं पाता था। हालांकि केष्टो मुखर्जी को जिंदगी में काफी स्ट्रगल करना पड़ा। उन्हें गंदी और मैली-कुचैली जगह में रहना पड़ा। खाने को अन्न का एक दाना भी नहीं था। पर स्ट्रगल की इस 'आग' ने केष्टो मुखर्जी को तपाकर 'कुंदन' बना दिया था। वो कुंदन, जिसने कई दशकों तक फिल्मी पर्दे के साथ-साथ लाखों लोगों के दिलों पर राज किया।

सात अगस्त को Keshto Mukherjee की 98वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस मौके पर 'मंडे मोटिवेशन' सीरीज में हम आपको इस अनूठे हीरे के स्ट्रगल की वो कहानी बताने जा रहे हैं, जो काफी इंस्पायरिंग है, और बहुत से लोग उससे अनजान हैं। यह कहानी खुद केष्टो मुखर्जी ने 1981 में 'स्टारडस्ट' मैगजीन को दिए इंटरव्यू में बताई थी।

Keshto Mukherjee Birthday:

केष्टो मुखर्जी का जन्म 7 अगस्त 1925 में कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही केष्टो को रुझान एक्टिंग की तरफ रहा। इसीलिए वह नुक्कड़ नाटकों का हिस्सा बने और खूब तारीफें भी मिलीं। अपने तीस साल लंबे करियर में केष्टो ने 90 फिल्मों में काम किया था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1952 में फिल्म 'नागरिक' से शुरुआत की थी। ऋत्विक घटक ने केष्टो मुखर्जी को उनके करियर का पहला रोल दिया था। इसके बाद वह 'बारी ठेके पलिए', 'अजांत्रिक' और 'जुकती तक्को और गप्पो' जैसी बंगाली फिल्मों में नजर आए। 1957 में आई फिल्म 'मुसाफिर' से केष्टो मुखर्जी ने बॉलीवुड में कदम रखे। उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, और 1996 तक काम किया।

केष्टो मुखर्जी की आखिरी फिल्म

केष्टो मुखर्जी के करियर की आखिरी फिल्म 1996 में आई 'आतंक' थी। वह 1981 में आई रेखा और राकेश रोशन स्टारर 'खूबसूरत' में भी नजर आए। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का 'बेस्ट परफॉर्मेंस इन कॉमिक रोल' का अवॉर्ड मिला था।

मैले-कुचैले कमरे में चूहों के बीच रहे, खूब शराब पीते

केष्टो मुखर्जी ने फिल्मों में जो मुकाम हासिल किया, उसे पाने से पहले बहुत ही दुखदायी स्थिति से गुजरना पड़ा। इंटरव्यू में केष्टो मुखर्जी ने अपने स्ट्रगल के दिनों की स्थिति शेयर करते हुए बताया था, 'मैं बहुत पीता हूं। मैंने तब शराब पीनी शुरू की थी, जब मैं घर छोड़कर बॉम्बे हीरो बनने आया था। मैं रेलवे क्वार्टर में बने एक गंदे और मैले-कुचैले कमरे में रहता था। वहां खाने को कुछ नहीं था, बस पीने को ही था। मैं पीता था क्योंकि मैं फ्रस्ट्रैटेड था। मेरे पास कोई काम नहीं था।'

'दारू मेरी सच्ची दोस्त, इसी ने स्टार बनाया'

केष्टो मुखर्जी ने आगे कहा था, 'मैं पीता था ताकि थोड़ा सो सकूं। इसलिए पीता था ताकि आसपास जो चूहे दौड़ रहे होते थे, उनके बारे में भूल जाऊं। मेरे बराबर में ही कुत्ता सोता था। मैं टेंशन भुलाने के लिए पीता था। सिर्फ दारू ही थी, जो मेरी सच्ची दोस्त थी। और ये दारू ही थी, जिसकी वजह से मुझे लोकप्रियता मिली। आजकल अगर कोई मेरा नाम लेता है तो दिमाग में 'बेवड़े' की छवि उभरती है। मैं अब अपने दोस्त को धोखा नहीं दे सकता। मैं अभी भी पीता हूं। बस एक ही दिन था, जब मैंने दारू की एक बूंद को हाथ नहीं लगाया था और वह था मेरी शादी वाला दिन।'

'फिर से गरीब नहीं बनना चाहता'

केष्टो मुखर्जी ने उसी इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें पता है कि भूखे पेट रहना और गरीब होना क्या होता है। इसलिए वह दोबारा उसी गर्त में नहीं जाना चाहते। उन्हें संतुष्टि है कि जिस घर में वह रह रहे हैं, उसे उन्होंने खुद अपने खून-पसीने की कमाई से बनाया है, और वह उसे कभी खोना नहीं चाहेंगे। केष्टो मुखर्जी से जब पूछा गया था कि क्या वह लगातार एक रोल (शराबी का) करके थक नहीं जाते? तो एक्टर ने जवाब दिया था, 'लोग चाहते हैं कि बेवड़ा का रोल प्ले करूं। मुझे तब तक डरने की जरूरत नहीं है, जब तक मैं लोगों को वो दे रहा हूं, जो वो चाहते हैं। मैं जानता हूं कि मेरी कोई क्लास नहीं है। ना ही मुझमें उम्दा एक्टर होने का घमंड है। मुझे पता है कि मैं करियर में ऊंचाइयां नहीं छू सकता। लेकिन मुझे क्लास नहीं चाहिए। मुझे पैसा चाहिए। क्लासी होने से मैं अपने बच्चों का पेट नहीं भर पाऊंगा। लेकिन पैसा होगा, तो मेरे पास सबकुछ होगा।'

1982 में हुआ निधन

लेकिन दो मार्च 1982 को केष्टो मुखर्जी इस दुनिया को अलविदा कह गए। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका काम और नायाब अदाकारी हम सभी के बीच जिंदा है।


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