भारत-रूस के रिश्ते के बीच आ गया रुपया, अरबों डॉलर वाले रुपए का कैसे हो प्रयोग, पुतिन हुए परेशान
Updated on
03-06-2023 06:57 PM
मॉस्को: यूक्रेन जंग की वजह से रूस और पश्चिमी देशों के बीच टकराव बढ़ा तो भारत के साथ रिश्ते नए मोड़ पर पहुंच गए। इस जंग के दौरान ही रूस ने भारत को तेल बेचना शुरू किया। भारत, रूसी तेल का टॉप खरीददार बन गया। दोनों देशों के रिश्ते काफी एतिहासिक हैं लेकिन अब इन रिश्तों पर रुपया भारी पड़ रहा है। रूस ने अमेरिकी डॉलर में होने वाले पेमेंट सिस्टम को हटा दिया था और अब उसके पास रुपए का ढेर लग गया है। रूस के पास इस समय करीब 147 अरब डॉलर की कीमत वाला रुपया पड़ा हुआ है। लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा है कि इसका फायदा कैसे उठाया जाए।
हर महीने लग रहा ढेर ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मॉस्को के पास वर्तमान समय में हर महीने एक अरब डॉलर की कीमत वाली रुपए की संपत्ति इकट्ठा हो रही है। लेकिन यह एकतरफा व्यापार संबंधों के कारण देश के बाहर फंसे हुई है। हर तिमाही में, व्यापार असंतुलन के दो अरब डॉलर से तीन अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका है और रूस इनका उपयोग भी नहीं कर सकता है।
साल 2022 के दौरान, विदेशों में निर्मित शुद्ध विदेशी संपत्ति में अनुमानित 147 बिलियन डॉलर की राशि जुड़ गई होगी। जो रकम रूस के पास अटकी है, वह काफी बड़ी है। इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि रूस ने साल 2022 में रक्षा पर 5.51 खरब रूबल या 68 अरब डॉलर खर्च किए यह जानकारी रॉयटर्स की तरफ से दी गई है।
विकल्प तलाशने में असफल भारत और रूस इसका विकल्प तलाशने के लिए दोनों देश रूस और भारत असफल रहे हैं। एक तरीका यह है कि रूस की संस्थाओं की तरफ से भारत के पूंजी बाजार में निवेश सहित विभिन्न भुगतान तंत्र स्थापित किए जाएं। हालांकि इसका समाधान आसान नहीं है क्योंकि रूस पूरी किश्त का प्रयोग नहीं कर सकता है। भारत में अभी विदेशी निवेशकों की तरफ से पूंजी प्रवाह पर प्रतिबंध है। दूसरा विकल्प यह है कि किसी तीसरे देश की मुद्राओं जैसे चीन के युआन या यूएई के दिरहम का प्रयोग किया जाए। इस तरह के समाधान पर सहमति बनेगी, इसकी संभावना भी बेहद कम है।
क्या बैंक स्वीकारेंगे रुपया! ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स में जुड़े रूस के अर्थशास्त्री अलेक्जेंडर इसाकोव ने कहा, 'भारत के साथ रूस का व्यापार तेजी से असंतुलित हो रहा है। रूस की तरफ से भारत को निर्यात तो बढ़ा है लेकिन आयात में उतनी तेजी नहीं आई है। रूस में अपने चालू खाते के अधिशेष को रुपए में बचाने की सीमा है।' उन्होंने कहा कि रूस के पास भारत की क्षमता के बराबर कोई वैकल्पिक तेल आयातक नहीं हैं। ऐसे में निर्यातक और बैंक धीरे-धीरे रुपए में निपटान स्वीकार करेंगे, ऐसा लगता है।
अगर भारत अपने तेल आयात में इजाफा भी करना चाहता हो तो भी मास्को ने तेल की कीमतों पर छूट कम करके उस भावना को मजबूत करने का कोई काम नहीं किया है। एक रिपोर्ट में हाल ही में दावा किया गया है कि चीनी मांग और तेल उत्पादकों की तरफ से अंत में कटौती की वजह से नई दिल्ली को वित्तीय वर्ष 2023 के दौरान भारी छूट मिली है।
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