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आरबीआई ने आखिर ब्‍याज दरों में कोई बदलाव क्यों नहीं किया? अमेरिका के साथ डील से कनेक्‍शन समझिए

Updated on 07-02-2026 02:40 PM
नई दिल्‍ली: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शुक्रवार को अपनी प्रमुख रेपो दर को 5.25% पर जस का तस रखा। ऐसा मजबूत इकोनॉमिक ग्रोथ और अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद टैरिफ दबाव में कमी के बीच हुआ। इस हफ्ते की शुरुआत में अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने बड़ी घोषणा की थी। उन्‍होंने वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच एक अहम समझौते पर सहमति बनने की बात कही थी। इस समझौते में भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने का प्रावधान है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था और बाजारों पर दबाव कम हुआ है। मॉनेटरी पॉलिसी का रुख 'न्यूट्रल' बनाए रखा गया। इससे पता चलता है कि दरें कुछ समय तक कम रहेंगी। सवाल यह उठता है कि आखिर आरबीआई ने ब्‍याज दरों में बदलाव क्‍यों नहीं किया।

आरबीआई ने दरें जस की तस क्यों रखीं?

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पॉलिसी स्‍टेटमेंट में कहा कि बाहरी चुनौतियां बढ़ी हैं। लेकिन, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का सफल समापन अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है। उन्होंने महंगाई को कंट्रोल में बताया।
आरबीआई चीफ के मुताबिक, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत ग्रोथ के अलावा कम महंगाई के साथ अच्छी स्थिति में है। वह बोले, 'महंगाई टॉलरेंस बैंड से नीचे बनी हुई है। उसका आउटलुक नरम बना हुआ है। हाई फ्रीक्‍वेंसी इंडिकेटर्स 2025-26 की तीसरी तिमाही और उसके बाद भी मजबूत ग्रोथ मोमेंटम जारी रहने का संकेत देते हैं।'संजय मल्‍होत्रा ने कहा कि यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ ऐतिहासिक ट्रेड डील पर हस्ताक्षर और अमेरिकी व्यापार समझौते के साथ ग्रोथ की रफ्तार लंबे समय तक बनी रहने की संभावना है।
वह बोले, 'तकनीकी-निवेश, अनुकूल वित्तीय स्थितियों और बड़े पैमाने पर राजकोषीय प्रोत्साहन से समर्थित वैश्विक विकास 2026 में पहले के अनुमान से थोड़ा अधिक मजबूत होने की उम्मीद है। हालांकि, बढ़ते जियोपॉलिटिकल फ्रिक्‍शन और बढ़ते व्यापार तनाव का संगम मौजूदा विश्व आर्थिक व्यवस्था को बिगाड़ रहा है।'

मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई के नतीजे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हैं । ज्‍यादातर प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ये टारगेट से ऊपर हैं। इससे मॉनेटरी पॉलिसी एक्‍शन में भिन्नता आ रही है। कारण है कि केंद्रीय बैंक अपने मौजूदा सहज साइकिलों के अंत के करीब हैं।

विशेषज्ञ कैसे डीकोड कर रहे RBI का फैसला?

एचडीएफसी बैंक की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता ने कहा, 'हम आगे चलकर पॉलिसी रेट पर लंबा विराम देख सकते हैं। 5.25% को टर्मिनल रेट के रूप में देखा जा सकता है। आरबीआई ने ट्रांसमिशन के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी देने की अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया। पिछले कुछ हफ्तों में डाली गई लिक्विडिटी को देखते हुए हमें वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में और लिक्विडिटी डालने की जरूरत नहीं दिखती।'

एलारा सिक्योरिटीज में इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की इकोनॉमिस्ट गरिमा कपूर ने कहा कि पहले से किए गए रेट कट के प्रभावी ट्रांसमिशन पर फोकस रखकर अर्थव्यवस्था में अच्छी ग्रोथ को देखते हुए आरबीआई की एमपीसी ने रेपो रेट को जस का तस रखने का फैसला किया। उन्‍होंने कहा, 'खाने की कीमतों के सामान्य होने और खराब बेस इफेक्ट के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका है। ऐसे में आगे रेट कट की गुंजाइश कम हो गई है।'

उनके मुताबिक, 'ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन में कोई झटका ही एक और रेट कट को बढ़ावा देगा। अभी के लिए हम आरबीआई से लंबे समय तक ठहराव की उम्मीद करते हैं।'

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