महिलाओं को अपने कानूनी और मजहबी अधिकार पता होने चाहिए, हम मर्दों से कमतर नहीं
Updated on
29-03-2025 05:29 PM
जम्मू की रहने वाली सादिया खतीब ने कभी सोचा नहीं था कि वह हीरोइन बनेंगी, मगर उनकी किस्मत उन्हें ग्लैमर जगत में ले आई। 'शिकारा' से अपने करियर की शुरुआत करने वाली सादिया 'रक्षा बंधन' में अक्षय कुमार की बहन बनीं और अब जॉन अब्राहम की 'द डिप्लोमैट' में उज़्मा अहमद का वास्तविक किरदार निभा रही हैं। उनसे एक खास बातचीत।
सादिया खतीब ने अब्राहम पर क्रश और 'द डिप्लोमैट' में उनके साथ काम करने के एक्सपीरियंस के बारे में भी बात की। वह फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के लिए समान अधिकार और सैलरी पर भी बोलीं।
फिल्मों में आप लगातार महिलाओं की आवाज बन रही हैं, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी था, आपके लिए फेमिनिज्म क्या है?
-मुझे लगता है मेरे लिए फेमिनिज़्म यही है कि हम महिआलों को अपने अधिकार पता होने चाहिए। औरतों को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए, अपने मजहबी हक का पता होना चाहिए। आपको अगर अपने इन तमाम राइट्स की जानकारी हो, तभी आप कुछ बात कर सकते हैं। मैं मानती हूं कि मैं मर्द नहीं हूं। मैं 200 किलो नहीं उठा सकती, मगर यदि मैं डेस्क पर काम कर रही हूं, तो मुझे भी मेल एम्प्लॉइज की तरह बराबरी का पैसा मिलना चाहिए। मेरे लिए महिलावाद के मायने हैं, समान अवसर और समान पैसे। साथ ही मैं ईक्वल रिस्पेक्ट भी चाहूंगी। कोई भी धर्म या संविधान हमें सेकंड क्लास सिटीजन की श्रेणी में नहीं रख सकता। हम ईक्वल हैं। हम भले मर्दों से अलग हैं, मगर हम उनसे कमतर नहीं हैं।
एक लड़की होने के नाते क्या आपने कभी हीनता महसूस की है?
-मुझे लड़की होने के नाते भी ह्युमिलिएट होता है, जब हमें कमतर साबित करवाया जाता है। जब कभी काम की जगह पर आपको आपके जेंडर के कारण कमतर महसूस करवाया जाता है, तो बहुत हीन महसूस होता है। अगर हमें काम पर रखा गया है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हमें खरीद लिया गया है। हम उस काम को करने के लिए बाध्य हैं, जिसके पैसे हमें दिए जा रहे हैं। हम दूसरी किसी चीज के लिए बाध्य नहीं हैं। जब लोगों को लगता है कि उन्होंने आपको मौका दिया है और वे आपसे कुछ भी करवा सकते हैं, तो ये मुझे बहुत बुरा लगता है। इससे औरत की इंटीग्रिटी को आघात पहुंचता है।
आपके करियर की शुरुआत जाने-माने फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की 'शिकारा' से हुई, आपने उनसे क्या सीखा?
-मुझे लगता है सिनेमा की एक संपूर्ण समझ विधु विनोद चोपड़ा जी से ही मिली। किरदार में नैचुरल रहना उन्होंने ही सिखाया। उनसे मैंने जाना कि एक किरदार की रिदम को कैसे बनाए रखते हैं। मैं उन्हें अपना पहला गुरु मानती हूं। वो हमेशा कहते थे कि एक्टर को अपने इंट्यूशन पर यकीन रखना चाहिए ,उसे हमेशा अपने फ्लो के साथ बहना चाहिए। फिल्म का जो भी रिजल्ट रहा हो, मगर आज भी मुझे मौका मिले, तो मैं शिकारा के सेट पर दोबारा जाना चाहूंगी।
आप कश्मीर से हैं, तो कश्मीर की इस कहानी से कितना जुड़ पाईं?
-सच कहूं, तो मेरे अपीयरेंस के अलावा उस किरदार में मेरा अपना कुछ भी नहीं था। 'शिकारा' की कहानी नब्बे के दशक की थी और तब मैं पैदा भी नहीं हुई थी। जब तक मैं पैदा हुई तब तक फिल्म में दर्शाया हुआ माहौल खत्म हो गया था। मैं जम्मू से हूं और जहां मैं पली-बढ़ी हूं, वहां हमारी पढ़ाई को-एड में हुई है। जहां पर कश्मीरी पंडित, कश्मीरी मुस्लिम सारे धर्म के लोग साथ मिलकर रहते हैं। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया, जैसा फिल्म में दिखाया गया है। मैंने भी सिर्फ कहानियां सुनी हैं, मैं तो आज के दौर की जेनज़ी लड़की थी, जो सेट पर इधर -हर मस्ती किया करती थी।
आपने जब अक्षय कुमार के साथ 'रक्षा बंधन' में उनकी बहन का रोल करना स्वीकार किया तो क्या तब आपको बहन की भूमिका में टाइपकास्ट हो जाने का डर नहीं था?
-बिलकुल, जब मैंने फिल्म फिल्म साइन की, तो हर किसी ने यही कहा कि मैं बहन क्यों बन रही हूं, कहीं मुझ पर बहन का ठप्पा न लग जाए, मगर ये समस्या तब होती, जब मैं किसी लव स्टोरी में बहन की भूमिका कर रही होती। 'रक्षा बंधन' की कहानी कोई प्रेम कहानी नहीं थी, यह तो भाई-बहन की कहानी थी, जिसमें मेरा सेंट्रल कैरेक्टर था और यह बात मुझे अक्षय सर ने ही समझाई थी। सच कहूं, मुझे ये टाइपकास्ट वाली बात जंचती नहीं। हो सकता है एकाध साल तक लोग आपको उस रूप में देखें, मगर फिर आपका काम सामने आ ही जाएगा।
सादिया खतीब सुना है कि एक जमाने में जॉन अब्राहम आपके क्रश हुआ करते थे और अब आप उन्हीं की हीरोइन बन कर आ रही हैं?
-(हंसते हुए) जब मैं स्कूल में थी, तब मैंने 'धूम' देखी थी और मुझे 'धूम' का कबीर (जॉन अब्राहम) का किरदार बहुत पसंद आया था, तो जॉन मेरा बचपन का क्रश रहे। मुझे 'शिकारा' में काम करने का मौका मिला, तो मैंने एक इंटरव्यू में कहा था, जॉन मेरे क्रश हैं। तब मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं भविष्य में उनकी फिल्म की हीरोइन बनूंगी। आज बहुत गर्व महसूस कर रही हूं कि जॉन सर के साथ काम कर रही हूं। वे बहुत ही पैशनेट और समर्पित कलाकार हैं।
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